मनुष्य का एक वर्ग ऐसा है, जो योग और योगदान विषय पर प्रवचन तो करता है; परन्तु आचरणस्तर पर जब योगदान करने (यहाँ ‘देने’ अशुद्ध है।) का विषय आता है तब कुतर्क की क्षणिक स्थापना करने का प्रयास करता है। योगिराज श्री कृष्ण का विधिविधान/विधि-विधान/विधि और विधान (द्वन्द्व समास; ‘द्वन्द’ अशुद्ध है।) के साथ /बहुविध (‘बहुविधि’ अशुद्ध है। महिमामण्डन करता है; परन्तु उनका मूल ज्ञान ‘कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, परिणाम पर कभी नहीं’ को विस्मृत कर सभी परिणाम (‘परिणामों’ का प्रयोग अशुद्ध है।) अपने ही पक्ष में बलपूर्वक खींच लाता है। ऐसे में, यदि मनुष्य कर्मरहित होकर केवल ‘परिणामसहित’ दिखे तो योगेश्वर/योगीश्वर/योगेश/योगीश श्रीकृष्ण के प्रति अनुरक्ति का औचित्य क्या है?
आज बहुत बड़ी संख्या में कदाचारी-अत्याचारी-अनाचारी कर्मविहीन लोग श्री कृष्ण का नाम ले-लेकर गुणगान करते दिख रहे हैं। उनका कृत्रिम कृष्णानुराग और सतही आस्था मात्र क्षणिक है। कल पुन: वे पापकर्म में रत हो जायेंगे। ऐसा उत्साह किस हेतु? शोचनीय है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० अगस्त, २०२१ ईसवी।)