दिन छोटे रात लम्बी होने लगी
गुनगुनी धूप छत पे उतरने लगी।
बढने लगी हाँ ठिठुरन बढने लगी।
आ गई ठण्ड रजाई ले लीजिए,
दूध के संग मलाई ले लीजिए।
बाजरे की रोटी; बेसन की करी,
घी-मक्खन की तराई ले लीजिए।
जिह्वा से कितनी लार टपकने लगी,
बढने लगी हाँ ठिठुरन बढने लगी।
आंच मे भुजाओं को सेक लीजिए।
थोड़े ऊनी कपड़े पहन लीजिए।
गुड़, गजक, मूंगफली और गाजर का,
हलवे का जायका भी चख लीजिए।
अभ्र की ओट में धूप छुपने लगी,
बढने लगी हाँ ठिठुरन बढने लगी।
—निहाल सिंह
झुंझनू, राजस्थान