★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक–
सीना ठोंके हर जगह, कितना चतुर-सुजान।
‘हिटलर’ बनता देश का, खोता अपनी आन।।
दो–
बनता कभी फ़क़ीर है, कभी जाति का नीच।
चौकीदारी यों करे, जैसे पानी कीच।।
तीन–
निर्मम-निर्दय रूपमय, मूल भरा पाखण्ड।
सम्प्रदाय को बाँटकर, करता देश विखण्ड।।
चार–
कोई परिभाषा नहीं, रिक्त दिख रहे कोश।
बिखरा दिखे समाज है, किसे कहाँ है होश।।
पाँच–
असर शाप का कुछ नहीं, है कलियुग-पहचान।
महापाप है कर रहा, समझ सभी नादान।।
छ: —
घड़ा पाप का भर रहा, धीरे-धीरे जान।
दानव-सा है दिख रहा, अन्त बुरा है मान।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ९ नवम्बर, २०२१ ईसवी।)