डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
आइए जनाब!
मैं प्यार बेचता हूँ।
किसिम-किसिम का प्यार
तरह-तरह का प्यार
भाँति-भाँति का प्यार
नाना प्रकार का प्यार
विविध प्रकार का प्यार।
आप प्यार, आम प्यार, ख़ास प्यार
मर्दाना प्यार, जनाना प्यार, मेहराना प्यार।
प्यार-ही-प्यार :—
बड़ा प्यार, मझोला प्यार, छोटा प्यार
गारण्टीवाला-वारण्टीवाला प्यार।
थोक प्यार-खुदरा प्यार
ब्राण्डेड प्यार, मिक्स्ड प्यार, लोकल प्यार।
गोला प्यार, तिकोना प्यार, चौकोर प्यार।
हाथी-छाप, कमल-छाप, साइकिल-छाप प्यार
पंजा-प्यार, हँसुआ-बाली प्यार।
अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक प्यार,
दलित प्यार, स्खलित प्यार
असवर्ण-सवर्ण प्यार, साम्प्रदायिक प्यार
अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति प्यार
बैकवर्ड प्यार, फॉरवर्ड प्यार।
प्यार-ही-प्यार।
न पसन्दआये तो बदल लो प्यार।
हुज़ूर!
मैं प्यार का तिज़ारत भी करता हूँ।
थोक माल का विक्रेता जो ठहरा।
पहले फुटकरिया माल बेचता था,
अब एजेंसी खोल रखा हूँ।
फ्रेंचाइज़ी भी देता हूँ।
मेरी एजेंसी का भूमण्डलीकरण भी हो चुका है।
सार्क से लेकर राष्ट्रमण्डल तक,
किसान-आन्दोलन से गुटनिरपेक्ष आन्दोलन तक
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से संयुक्त राष्ट्रसंघ तक।
विश्व हिन्दू परिषद् से माध्यमिक शिक्षा परिषद्
मण्डल आयोग से उत्तरप्रदेश अधीनस्थ सेवा चयनआयोग तक;
बेनामवर से लेकर नामवर तक,
मेरी एजेंसी की फ्रेंचाइचीज़ लेकर
प्रगतिशील प्यार का परचम लहराते हुए
जनवाद की रेवड़ी बाँटते आ रहे हैं
और उसका स्वाद कचरते हुए,
पंचसितारा बीयर-बार में प्राणायाम की मुद्रा में
आमलेट और बिरियानी सटकाते हुए,
नारी-विमर्श और दलित-विमर्श की पटकथा लिख रहे हैं।
मेरे भाई और बहनो, मितरो!
ज़रा सोचिए तो :–
क्या कभी इतने तरह के प्यार सम्भव हैं क्या?
यह तो एक प्रकार की जुम्लेबाज़ी है।