सत्याधार-
आँसू और उदासी ने जब जीवन पथ पर साथ निभाया,
तो फिर इन्हें छोड़ खुशियों संग मैं विवाह कैसे कर लेता?
आँसू बन जाते हैं स्याही , और रौशनाई होता दिल !
लेकर कलम स्वयं बन बैठा मैं अपने ही दिल का कातिल
जितना इसके पीछे जाऊँ , उतनी मंजिल दूर हो रही !
खोना ही मेरा जीवन है ,कुछ भी नहीं हुआ है हासिल !
वो दो पाकीज़ा सी आँखें ,बस मेरा अफसाना कहती ,
फिर भी उन्हें चूम लेने का मैं गुनाह कैसे कर लेता ?
मेरी राहों पर कांटों ने फूलों सा अहसास कराया !
दुखी हुआ तो गम नें मेरे मुझको अपने गले लगाया !
ज़ख्मों नें मेरे ज़ख्मों पर स्वयं लगाया आकर मरहम,
मेरे जीवन में अक्सर ही बुझे दियों नें दीप जलाया !!
मेरे वसन फटे हैं फिर भी मुझको बहुत सुकून दिलाते,
तो फिर इन्हें छोड़ चोली संग मैं निबाह कैसे कर लेता?