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हूँ तो मैं भी पत्रकार पर, ऐसा जिस पर क़लम लजाती

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’

डरता नहीं, न ही झुकता हूँ ।
जो मन आए करता हूँ ।
कहने को तो क़लमकार हूँ
पर सच कहने से डरता हूँ ।
हमने गिरवी क़लम डाल दी
सरकारी, दरबारी कोठों पर ।
गाँधी का बन्दर बन बैठा
रखकर उंगली होठों पर ।
पत्रकार बनकर सत्ता का
दासत्व स्वीकार कर लिया है ।
चारण बन स्तुति गान कर रहा
कण्ठ में पट्टा डाल लिया है ।
चाह हमारी भी सत्ता का सुख
राह हमारी क़लम बनाती ।
हूँ तो मैं भी पत्रकार पर
ऐसा जिस पर क़लम लजाती ।।