◆ आचार्य की पाठशाला की ओर से किये गये प्रश्न ‘देखने’ और ‘उत्तर’ देने मे अत्यन्त सरल लगते हैं, जबकि वे होते नहीं हैं; क्योंकि उसके लिए ‘शरसंधान’ की भाँति ‘शब्दसंधान’ करना पड़ता है।
१– परिवेष– इसमे मूल शब्द ‘वेष’ है, जिसके अनेक अर्थ हैं :― परिवर्त्तित भेस; कर्म; वेश्यालय; नेपथ्य आदिक। ‘वेष’ से पूर्व ‘परि’ उपसर्ग है, जिसका अर्थ ‘परित:’ (चारों ओर से) है। ‘वेष’ शब्द ‘विष्’ धातु का शब्द है, जिसका अर्थ है, ‘व्याप्त होना’। इस धातु मे ‘अच्’ प्रत्यय का योग है, जिसके सूत्र के अनुसार, ‘परिवेष’ नामक संज्ञा-शब्द का सर्जन (‘सृजन’ अशुद्ध है।) होता है। इस ‘परिवेष’ शब्द के भी अनेक अर्थ हैं :― आवेष्टित करनेवाली वस्तु; प्रभामण्डल आदिक।
२– परिवेस― यह शब्द अशुद्ध है और अनुपयुक्त भी; क्योंकि मूल शब्द ‘वेस’ तत्सम (संस्कृतनिष्ठ) नहीं है। यद्यपि ‘वेस’ शब्द सार्थक है तथापि ‘परिवेस’ निरर्थक शब्द है; क्योंकि ‘परि’ शब्द संस्कृतनिष्ठ है और ‘वेस’ एक प्रकार की बोली, इसलिए ‘सजातीय’ और ‘विजातीय’ शब्दों का सम्मिलन उन शब्दों के मिले हुए रूप को अशुद्ध कर देता है। ‘वेस’ शब्द का ‘वयस’ (चिड़िया; अवस्था) के अर्थ मे ‘स्थानिक’ (किसी स्थान-विशेष मे ही होनेवाला) वा बोली के रूप मे व्यवहार होता है। इस ‘वेस’ शब्द मे जैसे ही ‘परि’ उपसर्ग जुड़ता है, यह ‘परिवेस’ शब्द अशुद्ध, अनुपयुक्त तथा निरर्थक हो जाता है।
३– परिवेश― इसका मूल शब्द ‘वेश’ है, जिसके अनेक अर्थ हैं :― प्रवेश; घर; कार-बार (‘कारोबार’ अशुद्ध है।); पारिश्रमिक आदिक। इसके पूर्व मे ‘परित:’ (चारों ओर से) के अर्थ मे ‘परि’ उपसर्ग जुड़ा हुआ है। ‘वेश’ ‘विश्’ धातु का शब्द है, जिसका अर्थ है, ‘प्रवेश करना’। इस ‘विश्’ धातु मे ‘घञ्’ प्रत्यय के जुड़ते ही ‘परिवेश’ शब्द की उत्पत्ति होती है। इस परिवेश के अनेक अर्थ हैं :― प्रवेश; प्रवेशद्वार; वेश्या का घर; शिविर आदिक।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ११ मई, २०२३ ईसवी।)