पुरुष परिधि पर घूम रही नारी बेचारी

शूद्र गँवार ढोल पशु नारी
ये ताड़न की अधिकारी है।
जाति-पाँति से हीन रही
युग-युग से वह बेचारी है।
बुद्धिमान होकर भी नारी
जाहिल समझी जाती है।
गैरों का पाप लिए सिर पर
वह दर-दर ठोकर खाती है।
जीवन उसका ढोलक सा है
वह भीतर-भीतर से खाली है।
अंतर-अंतस मे टूट गयी है
वह सूखी पेड़ों की डाली है।
मेहनत करना बच्चे देना
पशुओं की जिम्मेदारी है।
नजर उठा कर देख लीजिए
नारी की यही निशानी है।
ढो-ढो कर पुरुषत्व की मैला
अछूत हो गई नारी है।
घोर निराशा में डूबी है
सर्वत्र भटकती नारी है।
युग बीते पर रात अंधेरी
नारी जीवन में ठहर गयी।
बनकर लहर समंदर की
वह अपने मे ही उलझ गयी।
नारी का सम्मान जहाँ हो
वहीं देवता बसते हैं।
किंतु देवता ही ज्यादातर
नारी की गर्दन कसते हैं।
कोल्हू का बैल बनी नारी
पुरुष परिधि पर घूम रही।
आखिर उसकी पहचान है क्या
वह कातर दृष्टि से ढूंढ रही?