— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
सृष्टि का जो अंश,
पल रहा है तुम्हारी कोख में;
उसे न तो ‘राम’ की माला पहनाना
और न बाँधना ‘रहीम’ की ताबीज़;
उसे रहने देना सिर्फ़ उस इंसान की सन्तान,
जिसका न कोई ‘धर्म’, न कोई ‘मज़हब’ तथा न कोई ‘रीलिजन’।
अपनी सन्तान को
न किसी ‘मस्जिद’ की ओर रुख़ होने देना
और न ही किसी ‘मन्दिर’ की ओर।
न तो चस्पा होने देना उस पर–
किसी ‘वाहे गुरु’ का शब्द
और न तो उसके गले में लटकने देना
किसी ‘क्रॉस’ का फन्दा।
उसे जीवन का मर्म समझाना
और देना इंसानियत की सीख।
जानती हो न !
‘प्रार्थना’ और ‘अज़ान’ के यही ठीकेदार
हमें डाल आये थे,
दो ऐसी अन्धी सुरंगों में,
जहाँ हर पल मातमी अनुगूँज उठती थी,
मानो कोई जीवन्त क़ब्र बनाते हुए
मर्सिया गा रहा हो।
हम वर्षों तक हाथ-पैर मारते रहे
तभी–
हम तक छन कर पहुँची थीं
नूर की लकीरें
और तब भस्मीभूत हआ था,
‘धर्म’, ‘मज़हब’ तथा ‘रीलीजन’ का
बीभत्स चेहरा !
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ जुलाई, २०२० ईसवी)