मनीष सिंह :
नहीं, चौकिये मत। कोई तंज नही, कोई तल्खी नही। जब आपने यह खूबसूरत नाम दिया है, मुझे क्या एतराज हो सकता है। सबकी जिंदगी में कोई पप्पू, राजू, बबलू, गुड्डू, बिल्लू .. तो जरूर होता है। जो बेहद- बेहद करीब होता है। जिससे आप खुलकर मिलते हैं, डरते नहीं। भाई, भांजा, भतीजा … दोस्त ??? मैं भी वही हूँ। वैसा रहना चाहता हूँ। आपका पप्पू, राजू, बबलू और गुड्डू..
वही है, जो आपको हंसाते हैं, बतियाते हैं और संभालते हैं। आपकी खुशियों को, और आपके बिखराव को।जब अकेले न सँभल रहा हो, तो साथ देने के लिये, हाथ थामने के लिए, कंधे दबाने के लिए पहली कॉल किसे लगाते है?
पप्पू? गुड्डू? राजू? –यकीन कीजिये, जब से होश संभाला है, बस संभालता आया हूँ। उम्र नही थी, छोटा था.. कोई दस साल का। घर पर दो अंकल के साथ बैडमिंटन खेलता था। एक सुबह उन अंकल के हाथ मे रैकेट नही, मशीनगन थी। मेरी दादी को, मेरे घर मे, मेरे दोनों अंकल ने मार डाला। अपनों से घाव खाना, सहना, माफ़ कर, मुस्कुराकर आगे बढ़ना, मेरा हादसों को इस तरह सम्भालने सफर तब से शुरू हो गया था।
उस वक्त पिता ने समेटा, सम्भाला। सफदरजंग रोड के उस घर मे रहना, हर रोज घायल करता था। हमने घर बदल लिया। दस जनपथ। हम अब प्रधानमंत्री के बच्चे थे, बेहद सुरक्षित। फिर एक दिन पिता लौटे। सफेद चादर से ढंके। हम उनका आखिरी चेहरा भी नही देख सके।
मां टूटी हुई थी। हमने सम्हाला, सम्बल दिया। हमारा जिंदा रहना मां की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी। हम घर मे बन्द रहे, सारी सुविधायें, लेकिन जेल.. !! आज आप लॉकडाउन ने जिस तरह बन्द हैं, वैसे ही उम्र के सबसे नाजुक वर्ष, हम लॉकडाउन में रहे।
फर्क कि आपको बाहर निकलने पर डंडों का डर है, हमे गोलियों और बम का होता था। आप पूछेंगे की भला हमे कोई क्यों मारेगा। तो मां पूछती- दादी या पापा को क्यो मारी गयी?? –हम नही चाहते थे की माँ राजनीति से जुड़े। मां नही चाहती थी, की हम राजनीति से जुड़ें। पर इस परिवार में जन्म की कुछ मजबूरियां हैं।
हम पुरखों की विरासत को मिट्टी में मिलते नही देख सकते। विरासत, ये देश.. जो मन्दिर मंडल में उलझा था। कांग्रेस कमजोर थी। मां ने जिम्मेदारी ली। टूटी फूटी कांग्रेस जुड़कर एक बार फिर से सत्ता में थी। मां को थामे रखने मैं भी आया। राजकुमार की तरह स्वागत हुआ। मोस्ट इलिजबल बैचलर, फ्यूचर पीएम, और जाने क्या क्या..
पांच साल बाद हम फिर जीते। मौका था, मगर मुझे रुचि न थी। न मंत्री बनने की, न प्रधानमंत्री की। सत्ता जहर है, और पीने वाले हमारे अपनो की लाशें हमारे आंगन में गिरी हैं।
दस साल बाद हम चुनाव हारे। पहले पहल लगा कि महज एक चुनाव की हार है। पर इस बार कुछ अलग था। सिर्फ सरकार नही बदली थी। यह देश बदल रहा था।
इसका रंग, इसकी तासीर, इसकी दिशा.. सिर्फ राजनीति की भाषा नही, पूरी व्यवस्था बदलने लगी। धीरे धीरे, सिस्टमेटिकली।यह महज राजनीति, कुर्सियों की उठापटक नही है। यह बेहद खतरनाक खेल है। इसका निशाना, लोकतन्त्र है, आजाद जिंदगी है, बराबरी और मोहब्बत का फलसफा है..
इसलिए निशाने पर मैं हूँ, आप है, हम सब !!! जिनका फलसफा मोहब्बत और बराबरी है. मुझसे ज्यादा मेरा सरनेम, उनकी राह का रोड़ा है। मेरा होना, जिन्दा और सामने खड़ा होना, उनका भय है। और यही मेरी जिम्मेदारी है। यही ताकत है।
मानता हूँ मैंने चुनाव हारे हैं। एक बड़ी और मजबूत ताकत के हाथों मेरी हार बार बार हो रही है। पर मुझे हराने वाली ये ताकत, भाजपा नही है, ये सरकार नही है।
ये ताकत जनता है। इस देश का युवा है, छात्र, व्यापारी, किसान , कर्मचारी है। जो अपनी भूमिका, कर्म, आदर्श,इतिहास, अपनी जरूरत और जिम्मेदारियों से मौन साधे बैठा है। जिन्होंने दिल ही दिल मे, गांधी, नेहरू, बुध्द, नानक और निजामुद्दीन को नकार दिया है।
जिसे नफरत और खून खराबे के जोश के पार समृद्ध भारत दिखता है। जो भीतर ही कहीं एक समुदाय के “फाइनल सॉल्यूशन” के ख्वाब में खोया है. समाज के विभाजन और दिलों की टूट पर खेलता ये भारत है. यह बिखरता हुआ भारत है।
और मेरी नियति.. बिखरे हुए को सम्भालना है। भूलना, माफ करना, मुस्कुराना, हाथ थामना, गले लगाना, बस यही आता है। यही मेरी राजनीति है। आपको यह कमजोरी लगे, तो ठीक है। आज आपका फैसला सर माथे..
मगर जब आप नफरत से थक जाएं, दिल डूबने लगे। तो घबराएं नही, मैं यही हूँ। बस, एक काल लगाएं और कहें;
हैलो.. पप्पू ??