धर्म, सत्य और तर्क की महागाथा
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– अयोध्या नगरी उत्सवों से सजी रहती थी। महाराज दशरथ के राज्य में प्रजा सुखी थी। चारों राजकुमार राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न राज्य का प्राण थे। उनमें भी श्रीराम सबसे प्रिय […]
डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव– अयोध्या नगरी उत्सवों से सजी रहती थी। महाराज दशरथ के राज्य में प्रजा सुखी थी। चारों राजकुमार राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न राज्य का प्राण थे। उनमें भी श्रीराम सबसे प्रिय […]
भारतीय परम्परा के आधुनिक नैतिकता से अधिक वैज्ञानिक होने का प्रमाण : नियोग भारतीय वैदिक परंपरा को लेकर आज एक सामान्य प्रवृत्ति दिखाई देती है कि हम उसे या तो आँख मूँदकर पूजते हैं या […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• एक बार अधर्म ने धर्म से कहा, “धर्म भाई! मृत्युलोक मे ऐसा एक भी व्यक्ति नहीँ दिखता, जो तुम्हारे तात्त्विक रहस्य को जान सके; इसका कारण क्या है?” धर्म ने […]
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• एक–महाकुम्भ के पर्व पर, भाँति-भाँति के लोग।कहते ख़ुद को साधु हैँ, सांसारिक है भोग।।दो–भौतिकता मे लिप्त हैँ, भस्म लगाये वेश।कान्ति अलक्षित दिख रही, कहे कहानी केश।।तीन–धर्म सड़क पर आ गया, […]
——-० यथार्थ-दर्शन ०——- ● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• एक–राजनीति की कोठरी, कितनी है बदरंग!चेतन-पक्ष अलक्ष है, कूप पड़ी है भंग।।दो–जनहित दिखता है कहाँ, प्रतिनिधि बिकते रोज़।गुण्डे-लम्पट हैं दिखे, कौन करेगा खोज?तीन–दिखे कुशासन देश मे, न्याय […]
प्रश्न:-हमारे धर्मशास्त्रों में नर और नारायण का वर्णन है, नारायण तो स्वयं भगवान विष्णु हैं तो नर कौन है ..?साधारण बोलचाल की भाषा में नारी शब्द का इस्तेमाल किया जाता है।तो नारी का क्या अर्थ […]
धर्म तो विश्वास और अविश्वास के बीच की कड़ी है!ये हमारे जीवन को कैसे प्रभावित करती है..? धर्म किसी के विश्वास और अविश्वास का मोहताज नहीं होता।बल्कि धर्म तो संसार की सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु है। […]
राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’– निर्विवाद रूप से ईश्वर एक है। इसी सत्य के आधार पर मनुष्य अपनी संस्कृति, धरती, जाति, भाषा और विश्वास (मान्यता) के अनुसार ईश्वर, भगवान, ख़ुदा, अल्लाह, परमात्मा, गॉड आदि अलग-अलग नामो […]
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सृष्टि का जो अंश,पल रहा है तुम्हारी कोख में;उसे न तो ‘राम’ की माला पहनानाऔर न बाँधना ‘रहीम’ की ताबीज़;उसे रहने देना सिर्फ़ उस इंसान की सन्तान,जिसका न कोई ‘धर्म’, […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ‘धर्मभाई’ का अर्थ है, ‘धारण किया हुआ भाई’। जैसे आपने गुण-दोष को धारण कर लिया है वैसे ही आपने उस ‘भाई’ को भी धारण कर लिया है– मनसा-वाचा-कर्मणा। वह धर्म भाई ‘सगे […]
संचालक- डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय लोक संसद में आज का प्रश्न- ‘हिन्दू-समाज’ जयश्री राम’ के स्थान पर ‘जयश्री भरत’ क्यों नहीं कहता? देवेन्द्र कुमार तिवारी- सत्य हैं, इससे देश की एकता और अखंडता को बल मिलेगा। प्रदीप […]