देखो जनता बँट गयी, धर्म, वर्ग औ’ जाति

——-० यथार्थ-दर्शन ०——-

एक–
राजनीति की कोठरी, कितनी है बदरंग!
चेतन-पक्ष अलक्ष है, कूप पड़ी है भंग।।
दो–
जनहित दिखता है कहाँ, प्रतिनिधि बिकते रोज़।
गुण्डे-लम्पट हैं दिखे, कौन करेगा खोज?
तीन–
दिखे कुशासन देश मे, न्याय दिख रहा मौन।
तानाशाही हर जगह, प्रश्न करेगा कौन?
चार–
बिकने को तत्पर दिखें, जनता-प्रतिनिधि रोज़।
बिकते हैं मत जन यहाँ, बिकती है हर खोज।।
पाँच–
देखो! जनता बँट गयी, धर्म, वर्ग औ’ जाति।
बँटता देखो! मौन भी, बँटती सारी पाँति।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३१ जनवरी, २०२४ ईसवी।)