ज़ह्र-ज़ह्र होता पर्यावरण!
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हुस्न की रंगत,चाह की संगत;अब ‘भाती’ नहीं।तनहा-तनहा तन,रीता-रीता मन;अब ‘साथी’ नहीं।उदास है घोंसला,ज़ह्र-ज़ह्र पर्यावरण;चिड़िया ‘आती’ नहीं।प्रकृति नहीं स्वच्छ,वायुमण्डल विषाक्त;कलुषता ‘जाती’ नहीं। (सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ नवम्बर, […]