ब्लॉक कोथावां में वोटर लिस्टों की बिक्री के नाम पर हो रही अवैध वसूली

जब मन न माने……

महेन्द्र नाथ महर्षि (सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी, दूरदर्शन)


महेेन्द्र महर्षि (सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी, दूरदर्शन)

जब फूलों की बहार आने लगी तो एक सुबह अपने ब्लाक के ऊपरी छज्जे पर मधुमक्खी का छत्ता नज़र आया। फिर तो रोज़ ही उसे देखना रूटीन बन गया। धीरे-धीरे यह बढ़ता गया। सुन्दर रचना करतीं हैं ये नन्ही परियाँ। कहते हैं छत्ता एक गाँव है जिसमें हर वर्ग के मधुमक्खी अनुचर अपनी रानी के लिए तन-मन से दिन भर मेहनत करते हैं। वे आने वाले समय के लिए फूल-फूल घूमकर मधु संकलन करते हैं और अपने बढ़ते परिवार के लिए घरों का निर्माण भी करते रहते हैं।

प्राकृतिक मोम के इन घरों की सुन्दर बनावट के लिए मधुमक्खियों की रचना कल्पना की ईजाद, हमें ईश्वर की सत्ता की याद कराती है। इन घरों को “हनीकोम्ब” भी कहा जाता है।
कोरोना के इस लाकडाउन काल में हम रोज़ाना के ढर्रे से फ़ुरसत पाते हैं तो ज़रा आँख और कान खोल कर प्रकृति की ओर मुड़ें। पक्षियों की चहचहाहट से सबेरा आँख खोलता है। पेड़ों में सरसराती हवा पत्तियों का मधुर संगीत सुनाती हैं। हारसिंगार के फूल सुगन्धित चादर बिछाए उन्हें चुन लेने का निमंत्रण देते हैं। जहां मधुमक्खियों की बस्ती बन जाती है वहाँ फूल-फुलवारी में इनकी आवक-जावक बे रोकटोक रहती है। ये फूलों का परागण करती हैं और बदले में मात्र बूँद से भी कम मीठा उठाकर अपने छत्ते की बस्ती में जमा कराने चली जाती हैं। आप पास खड़े देखते रहिए, वे कभी आपको छुएँगी भी नहीं।

मेरे ब्लॉक का छत्ता बडा होता जा रहा था। उसे देख कर मुझे अचरज होता कि मधुमक्खियाँ इसका बढ़ता आकार और भार सँभालने के लिए क्या तकनीक काम में लेती हैं।

अचानक एक सुबह मैंने कई सारी मधुमक्खियों का झुंड अपनी खुली बालकनी पर भिनभिनाते देखा। मुझे कुछ संदेह हुआ। मैं दरवाज़ा खोल छत्ते वाले छज्जे की तरफ़ गया। छत्ते का निचला भाग एक तरफ से झड़ा हुआ था। मुझे दुख हुआ। उन्होंने तो इतनी बड़ी बस्ती बनायी थी जिसे मैंने हमारे शहरों की अवैध बस्तियों की तरह आंका और दरवाज़ा बंद कर अपने कमरे में बंद हो गया। चूँकि रोज़ एकबारगी छत्ते को देखने की आदत बन गई थी तो अगली सुबह मैंने छत्ते के बचे हुए भाग को सलामत पाया। मक्खियों को अपनी बस्ती के टूटे मकानों की मरम्मत का काम भी आता है इसका अनुमान मुझे तब लगा जब दिनोदिन छत्ता फिर बढ़ने लगा।

अभी तीन-चार दिन पहले , मैं लगभग एक महीने बाद अपने घर से चेहरे पर दो दो मास्क लगाकर, हाथों को सेनीटाइजर से गीला कर, लिफ़्ट से नीचे आकर अपनी कार पार्किंग की ओर चला ही था कि मन धक्क सा रह गया। मधुमक्खियों के छत्ते का एक बड़ा हिस्सा कपड़े में लिपटा सा नीचे पड़ा था। कुछ मधुमक्खियों को मैंने वहाँ तड़पता पाया। मेरा मन आक्सीजन के अभाव में साँसें गिनते लोगों के उन दृश्यों से जुड़ गया जो हमारे टीवी स्क्रीन पर आजकल सामान्य दिनचर्या की तरह दिखाई दे रहे हैं। मगर मधुमक्खियों को कफ़न की रचना और ज़रूरत तो नहीं होती तो फिर यह कपड़े में आधे अधूरे तरह से कैसे लिपटीं हैं ?

मन खट्टा हो गया। निश्चित ही यह उस डरे हुए व्यक्ति का काम रहा होगा जिसे मधुमक्खियों की बस्ती से बू आती है या फिर वह उसकी रचना का मोल नहीं जानता।

मुझे क़रीब छ: दशक पूर्व दिवंगत हुई दादी की बात याद आई :
हमारे घर के परकोटे से लगा एक नीम का पेड़ था जिसपर गर्मियाँ शुरू होने पर सफ़ेद फूलों के गुलदस्ते लटक जाते और घर ख़ुशबू से महक उठता। नन्ही परी सी मधुमक्खियों के तीन चार छत्ते पेड़ पर लटक कर बड़े होने लगते। हम बच्चे छत पर जाने से डरते। दादी हिम्मत देतीं। कहतीं कि छेड़खानी मत करना , वे कुछ नहीं करेंगी। वे कभी छत्ते तोड़ने वालों को भी पेड़ के पास नहीं फटकने देती थीं। मक्खियाँ यों तो कभी काटती नहीं थीं पर दादी का तो कहना था कि छत्ता एक बस्ती है जिसे उजाड़ने का हमें कोई हक़ नहीं है चाहे फिर मक्खियाँ बच्चों के गाल सुजा दें। कहतीं कि सभी घरों को यह सौभाग्य नहीं मिलता। छत्ते भाग्यवानों के घर लगते हैं।

महेन्द्र महर्षि (सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी दूरदर्शन) बी-६०४, १२.५.२०२१

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