पृथ्वीनाथ पाण्डेय–
बेशक, चाहो पर बताओ नहीं,
बेशक, पाओ पर सताओ नहीं।
मुद्दत बाद ज़िन्दगी सयानी हुई,
उसे सब्ज़बाग़ दिखाओ नहीं।
मस्त-मौला है और फक्कड़ भी,
भूले-बिसरे भी आज़्माओ नहीं।
हक़ीक़त की ज़मीं ही बेहतर है,
ख़याली पुलाव अब पकाओ नहीं।
चाहत बिखरे तो बिखर जाने दो,
नाज़ुक पलकों पे सजाओ नहीं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १२ मार्च, २०२० ईसवी)