पृथ्वीनाथ पाण्डेय–
एक :
जब भी चाहा, उठाकर फेंक दिया,
दोस्ती का नाम देते शर्म आयी नहीं।
दो :
तुम भी आ जाओ, मेरे साये में,
दीवार होने की सज़ा मालूम है।
तीन :
बहके-बहके चलो और डगमगाते भी रहो,
मैकदे में साक़ी का भरम बनाते भी रहो।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ११ मार्च, २०१९ ईसवी)