‘लड़पोछन’ शब्द की सार्थकता?
‘लड़पोछन’ न तो कोई सार्थक शब्द है और न ही ‘अश्लीलता’ का बोध करानेवाला किसी भी प्रकार का शब्द है। ‘लड़पोछन’ मे दो शब्द दिख रहे हैं :― (१) लड़ (२) पोछन। इसमे से ‘लड़’ सार्थक शब्द है, जिसे प्राकृत-भाषा मे ‘लट्ठि’ कहा गया है और संस्कृत-भाषा मे ‘यष्टि’। ‘लड़’ पुंल्लिंग का शब्द है। इसे स्त्रीलिंग मे ‘लड़ी’ कहते हैं। ‘लड़’ का अर्थ है, ‘माला’। ‘लड़’ की परिभाषा है― जब एक ही प्रकार की वस्तुओं की पंक्ति एक-दूसरे के साथ जुड़ी हुई रहती हैं तब वह ‘लड़’ कहलाती है; जैसे― सिकड़ी का लड़ वा मोतियों का लड़ अथवा फूलों का लड़। किसी के साथ घनिष्ठता वा दृढ़तापूर्वक मिले होने का भाव अथवा अवस्था को भी ‘लड़’ कहते हैं।
‘लड़’ से सम्बन्धित मुहावरे देखें― लड़ मिलाना― मेल-मिलाप करना। लड़ मे रहना― गुट वा दल मे रहना।
अब ‘लड़’ के साथ जुड़े शब्द ‘पोछन’ को समझें।
‘पोछन’ निरर्थक शब्द है; सार्थक शब्द ‘पोंछन’ है, जिसका अर्थ ‘पोंछने के काम मे आनेवाली कोई वस्तु’ है। पोंछने के भाव अथवा क्रिया को भी ‘पोंछन’ कहते हैं।
जो भी जन ‘लड़पोछन’ शब्द को अश्लील और आपत्तिजनक मानते हैं, उनका मन्तव्य निराधार है।
यही ‘लड़’ शब्दभेद के विचार से क्रिया के रूप मे व्यवहृत होता है; जैसे― जा, उससे ‘लड़’। वह वीरतापूर्वक ‘लड़’ रहा है।
इस ‘लड़’ का शब्दयुग्म के रूप मे भी व्यवहार किया जाता है; जैसे― लड़-झगड़ (तुम पड़ोसी से लड़-झगड़कर आ गये?)। लड़-वड़ (तुम हमेशा कहीं-न-कहीं से ‘लड़-वड़’ कर आते हो।)।
यदि शब्द ‘लँड़पोंछन’ होता तो ‘आपत्तिजनक’ और ‘अश्लील’ माना जाता; क्योंकि भोजपुरी और अन्य बोलियों के अन्तर्गत इस शब्द का पुरुष के लिंग को पोंछनेवाली किसी वस्तु के रूप मे व्यवहार किया जाता है।
जब तक शब्द का सार्थक और तर्कपूर्ण अवबोध न हो तब तक सामाजिक प्रचलन मे ‘अन्यथा’ शब्दप्रयोग को स्वीकार नहीं करना चाहिए, फिर ‘लडपोछन’ को सामाजिक स्वीकृति भी प्राप्त नहीं है।
◆ ‘आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ नामक प्रकाशनाधीन कृति से सकृतज्ञता (साभार) गृहीत (लिया गया)।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ११ फ़रवरी, २०२३ ईसवी।)