आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

तत्सम, तद्भव, अर्द्ध-तत्सम, देशज तथा विदेशज शब्दावली का मनोहारी निदर्शन

कौन हो ‘तुम’?

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  मैं अपलक उसे निहार रहा था। राजहंस-सा गौर वर्ण, द्रुत विलम्बित-सी गति, अभिधावाणी, उपनागरिका वृत्ति-सी प्रकृति, प्रसाद गुण-सा शील, मासूम मुखमण्डल पर खिलता शृंगार-रस, अंग-अंग से फूटता हुआ शब्दालंकार; प्रतीक-विधान तथा बिम्ब-योजना का अनुपम समन्वयन।
  उसने कुछ कहा था; कोकिल कूजन-सी वाणी, रग-रग छलकनेवाली कला, शैशव का हास्य तथा ताश के तुरुप चाल-सी चितवन बरबस मुझे तरल और सरस बना रही थी।
   चम्पई रंग के शरीर में लिपटी हुई शुभ्र आकाश के रंग की साड़ी, विकसित कमलिनी-सा मुख पतले-पतले होठों में अठखेलियाँ करती हुई मुसकान, संगीत के स्वर में ढली हुई मीठी बातें, नीचे से ऊपर तक सादगी का आलम, विचारों में उच्चता, पवित्र स्नेह से भीगी हुई आँखों की मादकता, अनावृत पुस्तक-सा हृदय-प्रान्त, धुली हुई चाँदनी के सामान हँसी, बेतकल्लुफ़, किन्तु शिष्ट उम्र का शान्त उफान, जीवन में वसन्त-बहार का साम्राज्य, स्त्रीत्व की सुलभता, स्वाभाविकता तरंग बनकर तथा जीवन की सांस्कारिकता प्रवाह बनकर उसे हर दिल अज़ीज़ बना रहा था।
   मैं एहसास की गहराइयों में पैठता जा रहा था; भावुकता-ममता-स्नेह-निश्छलता की मन्दाकिनी उसकी रग-रग में प्रवहमान है। ज़िन्दगी की इतनी सीढ़ियाँ पार कर चुकने पर भी उसकी तरुणाई को अब भी बचपन सहलाया करता है। उसके रतनारे मदभरे नयनों में अब भी शैशव का भोलापन झाँका करता है।
   वह उठी थी; चली थी; प्रतीत हुआ; उसके जीवन पर आदर्शवाद, मानसिक द्वन्द्व तथा प्रबल जीवन-प्रेम का गहरा प्रभाव पड़ा था, तभी तो उसमें मालावार की वनिताओं की सी सादगी और निपुणता, कश्मीर की सुडौल भामिनी-जैसी चातुरी, महाराष्ट्र की तरुणियों की तरह प्रशान्त, बंगाली नवयुवतियों-सदृश स्वप्नमयी तथा राजपूतनियों की भाँति दृढ और शान्तप्रिय  है। 
    तुम कौन हो? --- उससे न मैंने पूछा, न उसने स्वयं बताया। यक्ष प्रश्न; तुम कौन हो? रूप की कर्पूर लौ-सी कामिनी! वारुणी तो तुम नहीं? स्वर्ण-कलशी गीतिका की अन्तरा तुम कौन हो? पुष्प-धनु की डोर पर बजती अनाहत अग्निसौरभ प्रणय-मातल रागिनी हो? स्वप्न हो वा सत्य हो? शिल्प का सौन्दर्य अथवा स्वर्णाभ आखर में रचित वह गीत, मन की बाँसुरी पर जो अजाने बज रहा है। (मूक) प्रतिमा भी नहीं हो। पुण्य जन्मों की तपस्या की कहानी, दीप्ति गौरवशालिनी तुम कौन हो?
     आह; दिव्ये! आचरण की प्रकृति, सम्बोधन का कारण बना है, अन्यथा नारी पुरुष की है, जो आदि-माता और उसका रूप सृष्टि का विस्तार है।
      साध्वी बाले! तुम्हारा सत्य तो पर्वत से विशाल और विस्तृत है। धन्य होगा वह पुरुष, जिसे तुम विश्वास दोगी; दृढ़ बाँहों का आधार दोगी; गीत दोगी; प्रीति दोगी तथा सर्जन का संगीत दोगी।
       'जातवेदस्' की प्रकृति ओ! वारो; मेरे आत्मा के सूर्य अर्पित गान को तुम......; किन्तु तुम कौन हो?  
       मैं; मैं स्नेह-सौजन्य-सदाशयता-शालीनता की समर्पित सुमन-माला पुनीता, उर्मिल वलय में अग्नि व्योम समेटती, 'आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला' की कविता-कामिनी हूँ |  

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ९ जुलाई, २०२१ ईसवी।)