शिवत्व की यात्रा का विस्तार : व्यक्ति से युगचेतना तक

शरद पूर्णिमा की रात्रि थी। चन्द्रमा का प्रकाश आश्रम की शिला-दीवारों पर शान्त चाँदी-सा बिछा हुआ था। हवा में न शीत का तीखापन था, न वर्षा की नमी—केवल एक निर्मल संतुलन। निरंजन उसी पीपल वृक्ष के नीचे बैठा था जहाँ उसने समाधि की दहलीज़ को स्पर्श किया था। परन्तु आज उसकी साधना भीतर की नहीं, बाहर की ओर उन्मुख थी। उसे अनुभव हो रहा था कि जो कुछ भीतर घटा है, वह अब समाज की धड़कनों में अपनी अभिव्यक्ति चाहता है।

आचार्य धीरे-धीरे उसके समीप आए। उनके चरणों की आहट भी मानो नाद की लय में थी। वे उसके सामने बैठ गए और कुछ क्षण तक चन्द्रमा को देखते रहे। फिर बोले—

“निरंजन, तुमने अपने भीतर शून्य का स्पर्श किया है। अब प्रश्न यह नहीं कि तुमने क्या अनुभव किया; प्रश्न यह है कि उस अनुभव का संसार के लिए क्या अर्थ है। शिवत्व केवल आत्मबोध नहीं है—वह युग-बोध भी है।”

निरंजन ने गम्भीरता से कहा—

“गुरुदेव, जब मैं भीतर देखता हूँ तो सब एक-सा प्रतीत होता है। परन्तु जब बाहर देखता हूँ, तो समाज में विभाजन, संघर्ष, अन्याय और अज्ञान दिखाई देता है। यदि सब शिवमय है, तो यह विषमता क्यों? क्या यह भी उसी लीला का भाग है?”

आचार्य ने गहन स्वर में उत्तर दिया—

“हाँ, यह भी लीला है—परन्तु यह निष्क्रिय स्वीकार की लीला नहीं, उत्तरदायित्व की लीला है। शिवत्व का अर्थ यह नहीं कि तुम संसार को केवल माया कहकर छोड़ दो। यदि विष है, तो नीलकण्ठ बनो; यदि अंधकार है, तो दीप बनो। अद्वैत का बोध तुम्हें यह दिखाता है कि सब एक है; परन्तु धर्म का बोध तुम्हें यह प्रेरणा देता है कि जहाँ संतुलन भंग हो, वहाँ हस्तक्षेप करो।”

निरंजन ने पूछा—

“परन्तु हस्तक्षेप करते समय अहंकार पुनः जागृत हो सकता है। सेवा करते-करते ‘मैं कर रहा हूँ’ का भाव लौट आता है। तब क्या करना चाहिए?”

आचार्य ने लम्बा उत्तर दिया—

“यही साधना का सूक्ष्मतम क्षेत्र है। जब तुम कर्म में उतरते हो, तो दो धाराएँ साथ चलती हैं—एक, बाह्य कर्म की; दूसरी, आन्तरिक साक्षी की। यदि साक्षी जागृत रहे, तो कर्म अहंकार को पुष्ट नहीं करता, बल्कि उसे गलाता है। जैसे अग्नि में आहुति डालने पर वह और प्रखर होती है, वैसे ही साक्षीभाव में किया गया कर्म चेतना को विस्तृत करता है। परन्तु यदि साक्षी सो गया, तो वही कर्म बन्धन बन जाता है।”

उन्होंने कुछ क्षण रुककर आगे कहा—

“शिवत्व का चौथा आयाम है—सामाजिक करुणा। अद्वैत तुम्हें सबमें अपने को देखने की दृष्टि देता है। जब तुम सचमुच सबमें अपने को देखते हो, तब अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना भी करुणा का ही रूप होता है। तब संघर्ष द्वेष से नहीं, संतुलन की आवश्यकता से प्रेरित होता है।”

निरंजन की आँखों में एक नई चमक उभरी—

“तो क्या शिवत्व का अर्थ यह है कि साधक समाज से विमुख नहीं, बल्कि अधिक उत्तरदायी हो जाता है?”

आचार्य ने दृढ़ स्वर में कहा—

“हाँ। जो समाधि से लौटा है, वह समाज से भाग नहीं सकता। वह जानता है कि यह जगत् उसी चेतना का विस्तार है जिसका उसने अनुभव किया है। इसलिए वह जगत् की पीड़ा को अपनी पीड़ा की तरह अनुभव करता है। यही करुणा बुद्ध को चलाती है, यही मर्यादा राम को वन तक ले जाती है, यही निष्काम कर्म कृष्ण को रणभूमि में सारथी बनाता है। यही शिवत्व साधक को लोकमंगल का साधन बनाता है।”

निरंजन ने दीर्घ श्वास ली। उसे लगा कि उसकी साधना अब एक निजी यात्रा नहीं रही। उसने कहा— गुरुदेव, यदि मैं समाज में उतरूँ, तो क्या मुझे आश्रम छोड़ना होगा? क्या गृहस्थ जीवन भी शिवत्व की साधना बन सकता है?

आचार्य ने मुस्कुराकर कहा— शिव स्वयं गृहस्थ भी हैं और संन्यासी भी। कैलास की समाधि और पार्वती के साथ संवाद—दोनों उनके जीवन का अंग हैं। इसलिए स्थान महत्वपूर्ण नहीं, चेतना महत्वपूर्ण है। यदि तुम्हारी सजगता बनी रहे, तो गृहस्थ जीवन भी योग है; यदि सजगता खो जाए, तो आश्रम भी संसार बन जाता है।

रात्रि और गहरी हो गई थी। चन्द्रमा अब वृक्षों के पीछे झुक रहा था। आचार्य ने अंतिम बात कही कि निरंजन, अब तुम्हें तीन स्तरों पर जागृत रहना है— पहला, अपने भीतर—कि अद्वैत का बोध स्थिर रहे। दूसरा, अपने कर्म में—कि वह धर्मानुकूल और निष्काम रहे। तीसरा, समाज में—कि तुम्हारा जीवन करुणा का माध्यम बने। जब ये तीनों एक हो जाते हैं, तब व्यक्ति युग-चेतना का वाहक बनता है। यही शिवत्व का विस्तार है।

निरंजन ने उनके चरणों में प्रणाम किया। उसके भीतर अब भय नहीं था, न ही किसी उपलब्धि का गर्व। केवल एक गम्भीर शांति थी और एक स्पष्ट दिशा। उसे लगा—समाधि एक शिखर थी, परन्तु यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई। अब उसे पर्वत से उतरकर घाटियों में जाना है, जहाँ लोग संघर्ष कर रहे हैं, जहाँ जीवन अपनी जटिलताओं में उलझा है।

उसने आकाश की ओर देखा। तारकाएँ स्थिर थीं, परन्तु पृथ्वी घूम रही थी। उसे लगा—शिवत्व भी ऐसा ही है—अंतरतम में अचल, व्यवहार में गतिमान। और उसी क्षण उसके भीतर एक संकल्प जन्मा— वह अपने अनुभव को शब्दों में नहीं, जीवन में उतारेगा। वह उपदेश नहीं देगा, उदाहरण बनेगा। वह समाधि में नहीं ठहरेगा, समाज में प्रवाहित होगा।