एक भोजपुरी शोक-गीत

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


इसके पहले कि आप इस शोक-प्रधान भोजपुरी गीत को पढ़ें , समझें तथा अनुभव करें, आपकी सुविधा के लिए इसकी पृष्ठभूमि का एक शब्द-चित्र प्रस्तुत है :——–
एक पिता का शव धरती पर है; बेटी पिता के मृत शरीर को आशान्वित होकर हिला-डुला रही है; पुत्री पिता से संवाद करना चाहती है; पुत्री के सिर पर अपने हाथ का संस्पर्श करते हुए मानो पिता बोल रहे हों, इस भोजपुरी-गीत के रूप में :—–


”हमारा ए देहिया* में जान अब नइखे। (*शरीर)
कैसे बोलीं बुचिया परान अब नइखे।।
हिलत-डोलत रहनी काल्हु ले* रे बबुनी! (कल तक )
भइल खतम सब जोर हो।।१।।
केहु हरदम संगे ना रहेला ए बिटिया!
देहिया के उमिर होखे ला रे बिटिया!
पालि-पोसि के हम बड़ कई दिहनी,
जिनगी के ओर ना छोर हो।।२।।
याद करु तोरा के कान्हा* पर घुमावत रहनी। (कन्धों)
रोवाला पर बानर बनि के बझावत* रहनी।। (*चुप कराना )
हमारा के सब कुछु अबो याद बा ए बबुनी !
काल* पर बा ना जोर हो।।३।। (*समय)
कवनो गलतिया होखी हमारा से कबहूँ।
माफ मति करिह तू हमारा के कबहूँ।।
हमारा त जिनगी के साँझ अब भइल,
तहरा जिनिगिया के भोर हो।। ४।।
छोट जब रहलू त बड़ करे खातिर जीयनी।
खुद ना खईनी बाकिर तहरा के खिययिनी।।
जिनगी-भर जियत रहिह सनवा* से बूची, (शान)
मत बनइह मनवा के चोर हो।।५।।
दोसरि घरि जइह त इ घरि भूलि जइह।
ओहि घरवा के आपनि घरवा समुझिह।।
सास-ससुर-मरद के जतन से रखिह।।
चाहे दुखवा आवे घनघोर हो।।६।।
बाबूजी अब नईखन त के करी चिन्ता ए बूची!
उपरि से त देत रहब हम आसिरबाद ए बूची !
जिनगी के अन्हेरिया* में हमारा के याद करिह, (*अँधेरा)
तहरा पासे भेजब अजोर* हो।। ७।। (*उजाला)
मत कबो जिनगी से उदास तू होखिह।
मत कबो जिनगी से निरास तू होखिह।।
भोर के किरिनियाँ फूटत रही जिनगी में,
बनब हरदम असवा के डोर हो।।८।।
एइजा* केहू ना आवेला सब घरि** खातिर। (*यहाँ,** घडी, समय)
सब केहू आवेला आपनि करम करे खातिर।।
बाबूजी छोड़ तारे अब तहन लोग के संगवा,
मत करिह मनवाँ के थोर* हो।।९।। (*उदास)
तोरा के हर बतिया पर डाँटत हम रहनी |
हरदम तोरा के हम पढ़े के कहत रहनी।।
अब तहरा के पढ़े खातिर के डाँटी ए बेटी!
भीजे लागल अँखिया के कोर हो।।१०।।
देत बानी तहरा के खूब असीसिया* ए बेटी! (आशीर्वाद )
जहाँ रहिह उहाँ खूब खुस रहिह ए बेटी!!
हम त सिधारत बानी अब आपन लोकवा,
रोक आपन अँखिया के लोर* हो।।११।। (*आँसू )