डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की प्रायोगिक पाठशाला

यह है, ‘न्यूज़ 24’ समाचार-चैनल। नीचे ‘न्यूज़ 24’ समाचार-चैनल-द्वारा २४ फ़रवरी, २०२० ई० को प्रसारित किये गये दो समाचार दिखाये गये हैं। आप अब नीचे प्रदर्शित किये गये दोनों चित्रों के भाषिक सत्य को समझें :–

पहला चित्र– सबसे ऊपर तीन बार ‘नमतस्यै’ का प्रयोग किया गया है और प्रत्येक ‘नमतस्यै’ के आगे ………. इस चिह्न का प्रयोग किया गया है, फिर ‘ट्रम्प’ शब्द का व्यवहार किया गया है। पहली बात, ‘नमतस्यै’ कोई सार्थक शब्द है ही नहीं; दूसरी बात, ‘नमतस्यै’ के आगे …….. इस ‘आवेशी चिह्न’/ ‘पदलोप चिह्न’ के प्रयोग करने का कोई औचित्य नहीं। शुद्ध शब्द ‘नमस्तस्यै’ है और उसके आगे अल्प विरामचिह्न का ही प्रयोग होगा। यदि शुद्ध शब्द ‘नमस्तस्यै’ के आगे भी ‘ट्रम्प’ लगा होता तो भी अशुद्ध होता; क्योंकि ‘नमस्तस्यै’ का अर्थ है, ‘उसको/उनको नमस्कार है।

वास्तव में, आज देश के समस्त समाचार-चैनलों में अपात्र-अयोग्य-असमर्थ महिला-पुरुष कार्यरत हैं। वे सभी चैनल हमारे समाज को भ्रमित करते आ रहे हैं, जो कि विचारणीय और शोचनीय है।

दूसरा चित्र– आज देश का औसत शिक्षित-प्रशिक्षित व्यक्ति “अतिथि देवो भव:” कहता-बताता-पढ़ाता दिखता है; अधिकतर पुस्तकों में “अतिथि देवो भव:” मुद्रित है, जबकि अर्थपूर्ण और शुद्ध सूक्ति है, “अतिथि देवो भव।” ऐसा इसलिए कि वह ‘भू’ धातु का शब्द है, जिसका अर्थ ‘होना’ है। इसी धातु के लोट् लकार के मध्यम पुरुष के एकवचन का शब्द ‘भव’ है, न कि ‘भव:’ है। इतना ही नहीं, कुछ लोग ‘भव्’ का भी व्यवहार करते हैं, जो कि शुद्ध नहीं है। ‘भू’ परस्मैपदी धातु-रूप है। यह ‘भ्वादिगण’ के अन्तर्गत आता है। भ्वादिगण की प्रथम धातु ‘भू’ है, इसीलिए इस गण का नामकरण किया गया है। धातु-पाठ के अन्तर्गत इस गण की कुल संख्या १,०३५ है। दस गणों में इसका प्रमुख स्थान है। संज्ञाओं में जो उपयोगिता-महत्ता अकारान्त-शब्दों (बालक, राम इत्यादिक) की है, वही क्रिया में ‘भ्वादिगण’ की है। ‘भू’ धातु के लोट् (आज्ञासूचक) लकार के मध्यम पुरुष का रूप है :– भव भवतम् भवत।

यहाँ संस्कृत के तीनों वचन हैं, जिसका एकवचन ‘भव’ है, जो कि व्याकरणसम्मत है।

समाज को ऐसी अनुचित शिक्षा देनेवाले अन्धकार-युग की काली छाया से सजग-सावधान रहना होगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २५ फ़रवरी, २०२० ईसवी)