आइए! ‘राष्ट्रीय प्रेस-दिवस’ को समझें

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

◆ आप सभी से सानुरोध आग्रह है कि इस आलेख मे किसी भी प्रकार का ‘प्रयोगदोष’/’प्रयोग-दोष’ (‘प्रयोग दोष’ निरर्थक प्रयोग है।) दिखे तो संबोध करायें; आभारी रहूँगा।

आज (१६ नवम्बर) ‘राष्ट्रीय प्रेस-दिवस (तिथि)’ है।

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आप हमारे इस तथ्यपूर्ण टिप्पणी मे ऐसे संदर्भों को समझेंगे, जिनसे आप सभी अनभिज्ञ रहे हैं।

हमारे देश मे बहुसंख्य सुशिक्षितजन ‘प्रेस-दिवस’ और ‘पत्रकारिता-दिवस’ को एक ही मानते आ रहे हैं और समझते भी, जो कि पूर्णत: अनुपयुक्त है। एक अन्य सुशिक्षित-वर्ग ऐसा है, जो दोनो दिवस (‘दिवसों’ अशुद्ध है।) को भिन्न-भिन्न मानता आ रहा है; परन्तु उनके उद्देश्य और उनकी अवधारणा से अनभिज्ञ रहता है। ऐसे पढ़े-लिखे लोग की भी संख्या बड़ी है, जो ‘प्रेस-दिवस’ को ‘छपाई करनेवाले यन्त्र’ (मुद्रक) के साथ जोड़कर देखते आ रहे हैं। हाँ, गिने-चुने जानकार हैं, जो ‘प्रेस-दिवस’ को समझते हैं।

अब आइए! हम ‘प्रेस-दिवस’ पर केन्द्रित हो लें।

अपने देश (भारत) मे प्रतिवर्ष १६ नवम्बर को ‘प्रेसदिवस’/’प्रेस-दिवस’ (‘प्रेस दिवस’ निरर्थक शब्द है।) का आयोजन किया जाता है। अब प्रश्न है, इस ‘प्रेस-दिवस’ के आयोजन का औचित्य क्या है? उत्तर है, औचित्य है। इतना ही नहीं, हमारे देश के बहुसंख्य पत्रकारवृन्द, जो अपने वाहनो पर ‘प्रेस’ लगाकर अपना कर्त्तव्य करते आ रहे हैं, उनमे से कदाचित् किसी को बोध हो कि वे ‘प्रेस’ अथवा ‘मीडिया’ क्यों लिखवा रहे हैं और कोई शब्द क्यों नहीं। हम इसे भी बतायें और समझायेंगे।

देश की राजधानी ‘दिल्ली’ मे एक स्वायत्तशासी (‘स्वायत्तशाषी’ अशुद्ध है।) विधिक संघटन (‘संगठन’ अशुद्ध है।) है, जिसका नाम ‘भारतीय प्रेस परिषद्’ (‘परिषद’ अशुद्ध है।) (Press Council of India) है। उसका मुख्यालय भी ‘दिल्ली’ मे ही है। वह परिषद् देश के पत्रकारों के हित (‘हितों’ अशुद्ध शब्द है।) मे योजनाएँ बनाती है; पत्रकारों की स्थिति सुदृढ़ करती है और उनका विधिक हितसंपोषण भी। (‘परिषद्’ स्त्रीलिंग-शब्द है।)

ऐसे पत्रकारीय संघटन की स्थापना ४ जुलाई, १९६६ ईसवी को दिल्ली मे की गयी थी; किन्तु वह १६ नवम्बर, १९६६ ई० से क्रियाशील हुई थी। यही कारण है कि जिस तिथि (१६ नवम्बर) से ‘भारतीय प्रेस परिषद्’ ने अपने कर्त्तव्य (‘कर्तव्य’ अशुद्ध है।) का बहुविधि निर्वहण करना आरम्भ कर दिया था, उसी तिथि को ‘राष्ट्रीय प्रेस-दिवस’ घोषित कर दिया गया था।

जिस भाँति ‘एक कुत्ता’ अपने संरक्षक के हित के प्रति स्वामिभक्त (‘स्वामीभक्त’ अशुद्ध है।) और सजग बना रहता है उसी भाँति प्रेस भी अपने पत्रकारों के हित के प्रति जागरूक और सतर्क रहता है और पत्रकारों को नैतिकता के साथ दायित्व-निर्वहण करने के लिए प्रेरित भी करता है। (यह अलग विषय है और शोचनीय (‘सोचनीय’ अशुद्ध है।) भी कि ‘भारतीय प्रेस परिषद्’ अपने मूल कर्त्तव्य से च्युत (पृथक्) हो चुकी है।) यही कारण है कि ‘प्रेस’ को ‘वाच डॉग’ और ‘प्रेस परिषद्’ को ‘मॉरल/मोराल वाच डॉग’ कहा गया है। (हमारे प्रतियोगी विद्यार्थियों के ‘सामान्य अध्ययन’-विषय के अन्तर्गत ये दो प्रश्न लिखित और मौखिक परीक्षाओं के समय किये (यहाँ ‘दिये’ अथवा ‘पूछे’ अशुद्ध हैं।) जा सकते हैं।)
वास्तव मे, हमारे पत्रकार/मीडियाकर्मी ‘सजग कुत्ता’ (वाच डॉग) हैं; क्योंकि ‘प्रेस’ को ‘वाच डॉग’ कहा गया है। यदि हमारे पत्रकारवृन्द/मीडियाकर्मी अपने वाहनो पर ‘सजग कुत्ता’ अथवा ‘वाच डॉग’ लिखवाकर निकलेंगे तो उनकी स्थिति ‘हास्यास्पद’ हो सकती है, इसीलिए वे ‘प्रेस’ अथवा ‘मीडिया’ लिखवाते आ रहे हैं।

‘वाच डॉग’ एक ऐसी पत्रकारिता है, जो स्वयं को ‘लोकतन्त्र का चतुर्थ स्तम्भ’ कहलाने के औचित्य को सिद्ध करती है। वह शासकीय-प्रशासकीय विसंगतियों को समाज के पटल पर निष्पक्ष ढंग से प्रस्तुत करती है, जबकि वस्तुस्थिति नितान्त विपरीत है। देश के लगभग सभी ‘वाच डॉग’ दुम हिलाने के अलावा सरकारी कुकृत्यों के सच को ‘सच’ की तरह से देखने मे समर्थ रहते हुए भी ‘असमर्थ’ दिख रहे हैं; क्योंकि शासकीय-प्रशासकीय भय का वातावरण और अघोषित आपात्काल सर्वत्र दृष्टिगोचर हो रहा है। समाचारपत्र और समाचारचैनल-स्वामी (‘स्वामियों’ अशुद्ध है।) के सरकारी संस्थाओं-द्वारा अपने गोरखधन्धा का पर्दाफ़ाश होने, विज्ञापन से वंचित रखने, अघोषित सम्पत्ति का हिसाब लेने आदिक का भय बना हुआ है, इसीलिए पत्रकारिता/मीडिया का ‘चारणी युग’ आरम्भ हो चुका है। “मरता क्या न करता”।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १६ नवम्बर, २०२२ ईसवी।)