बारिश की वो पहली बूंदें

बारिश की वो पहली बूंदे कलियों की
पलकों पर बैठकर टिमटिमाई होंगी,
बहती हुई बयारों से लिपटकर सर्द
नन्हीं शबनम छुपकर के नहाई होगी।

दरीचों से निकलकर के महीन बूंदें
फिर प्रांगण मे चुपके से गिरी होंगी,
कमरे के नर्म-नर्म मौसम की सूरत
आहिस्ता-आहिस्ता सी बदली होगी

चिमचिमाती एरावती की आहट से
पत्तों के कोमल हिय छलनी हुए होंगे,
उजले हुए ताल में अनगिनत परिंदे
तप्त अंशु के ताप में नहाये होंगे |

सहसा जब हंस निद्रा से जागकर के
नीर में स्वयं को डूबे पाये होंगे ,
फूलों के खिलते हुए सुर्ख अधरों पर
नवीन मौसम आकर के बैठे होंगे।

-निहाल सिंह, झुंझुनू, राजस्थान