● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
आज वह क्षण है, जो हमे बाध्य कर रहा है, अपने भीतर के सत्य और मिथ्या के साथ संवाद करने के लिए; क्योँकि वर्ष का वर्तमान ‘अतीत’ होनेवाला है; इतिहास की गोद मे बैठनेवाला है। सहजतापूर्वक समय-चक्र गतिमान है। हम सब का ‘बहुत कुछ’ कभी न खुलनेवाली एक गठरी मे बाँध कर रख दिया गया है, जिसे हम याद ही कर सकते हैं; किन्तु पा नहीँ सकते। कृषकाय वर्षांग ‘वर्षान्त’ का अवसान समीप देख कर, हमारे कन्धे पर अपने हाथो से स्निग्ध संस्पर्श करते हुए, हमारे-द्वारा जिये और भोगे गये प्रत्येक क्षण के मृदु और तिक्त कर्मो का प्रत्यक्षीकरण कर रहा है; इस विषय का अनुभव कराते हुए कि वर्ष का क्षण-क्षण अमूल्य है; समय के साथ विश्वासघात करोगे तो भयावह परिणाम को भोगने के लिए तत्पर भी रहना पड़ेगा।
वक़्त तो हवा का एक झोँका है, जिसे चाह कर भी हम पकड़ नहीँ सकते; हाँ, सदुपयोग कर सकते हैँ। इससे पूर्व कि मृतप्राय वर्ष हमसे मोह-भंग कर ले; आइए! हम अपने अन्तरात्मा से प्रश्न करेँ :– हमारा कर्म वर्षभर कितना नकारात्मक रहा और क्योँ? क्या हम उन नकारात्मक स्थितियोँ से स्वयं को विलग नहीँ कर सकते थे? उसके लिए हम किस हद तक उत्तरदायी रहे हैँ? हम क्षुद्र स्वार्थ-सिद्धि-हेतु मन के भीतर कुछ और मन के बाहर कुछ रखकर जीते आ रहे हैँ। कभी संवेदनशीलता के साथ विचार किया है– ऐसी मनोवृत्ति क्योँ और किसलिए? किसी के साथ परोक्ष-प्रत्यक्ष (‘अप्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष’ अशुद्ध है।) छल करना, ‘आत्मघाती’ कृत्य-सदृश (‘सदृश्य’ अशुद्ध है।) होता है। आपको क्षणिक सुख की अनुभूति हो सकती है; परन्तु स्थायी आपका वही कृत्य होगा, जिसके प्रतिक्रियास्वरूप आपको सात्त्विक आत्मतोष होता हो।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३१ दिसम्बर, २०२४ ईसवी।)