देश के मीडिया-तन्त्र की विचारशक्ति कितनी ‘क्षीण’ है!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


प्रत्येक मनुष्य की अपनी प्राथमिकताएँ होती हैं, जो पृथक्-पृथक् स्तर पर परिलक्षित होती रहती हैं। उन प्राथमिकताओं की पृष्ठभूमि में उसकी चिन्तन की गहनता और विचार की परिपक्वता होती है। उसके लिए कौन-सा विषय वांछनीय है और कौन-सा अवांछनीय, इनका निर्धारण वह अपने मन्थन के धरातल पर करता है, जो समष्टिमूलक होता है और व्यष्टिमूलक भी। विचार की यदि अतिव्याप्ति दिखती है तो उसके नकारात्मक और सार्थक परिणाम-प्रभाव पर भी दृष्टि-निक्षेपण करना अपरिहार्य हो जाता है।
सन्तुष्टि का आयाम बृहद् है। उसके अनेक कारक हैं। वह आत्मपरक अत्यधिक है, जिसमें कालुष्य की प्रबलता है। एक किशोर वय अथवा तरुण वय की आंगिक चेष्टाओं, जो नगण्य कोटि के अन्तर्गत निरूपित होती हैं और जिनमें संदूषित मनोवृत्तियाँ सक्रिय संलक्षित होती हैं, का अतिशयतापूर्वक प्रदर्शन जिस भाँति आज देश का मीडिया-तन्त्र कर रहा है, उससे सुस्पष्ट है कि उसकी प्राथमिकताएँ कितनी विकृति की ओर हैं। यही कारण है कि आज भारतीय समाज दिग्भ्रम की अवस्था में है; वह उचित-अनुचित का भान करने में स्वयं को समर्थ नहीं पा रहा है।
भारतीय समाज की नायक-नायिकाएँ धीरोदात्त,धीर-गम्भीर हुआ करती थीं। हतप्रभ करनेवाला विषय कि आज की नायक-नायिकाएँ वही, जो कुत्सित-गर्हित और क्षुद्र मन: स्थितियुक्त आंगिक चेष्टाएँ करती दिखें और अत्यधिक विडम्बना यह कि समाज उसका अनुकरण करे। ऐसे कृत्य कुछ क्षणों के लिए ऐन्द्रियिक तत्त्वों को सम्मोहित तो कर सकते हैं परन्तु उनको सन्तुष्ट नहीं कर सकते क्योंकि उनकी अपेक्षाएँ ‘हनुमान की पूँछ’-सदृश दीर्घ बढ़ने लगती हैं।
इसे एक प्रकार की वैचारिक कुण्ठा भी समझा जा सकता है। मीडिया-तन्त्र में कार्यरत युवक, विशेषत: युवतियाँ ही यदि किसी तरुणी के निरर्थक नयन-भंगिमाओं को अतिशयोक्ति का पुट देकर, उसे अपनी शीर्ष प्राथमिकता के रूप में प्रस्तुत करें तो ‘नारी-समाज’ के लिए एक ‘विचारणीय’ नकारात्मक प्रस्तुति कही जायेगी।
प्रगतिशीलता का आशय यह नहीं कि कोई असभ्यता का प्रदर्शन करे तो उसे अति व्याप्त कर, समाज के सम्मुख एक ‘आदर्श’ के रूप में देश का मीडिया-तन्त्र बहुविधि प्रचारित-प्रसारित करे। हाँ, इतना प्रकट हो चुका है कि “नीर-क्षीर विवेक” अब मीडिया-साम्राज्य के अधिकार-क्षेत्र से जाता रहा है और उस ‘क्षत-विक्षत’ मनोवृत्ति आराधना की जा रही है। ऐसे में, इस प्रकार के कुण्ठित-लुण्ठित लम्पट मीडिया-तन्त्र से समाज को निरापद बनाये रखना, जागरूक जन का परम दायित्व है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, १५ फरवरी, २०१८ ई०)
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