प्रेरक माया ही प्रेम है।
प्रेरक वृत्ति ही प्रेम है।
प्रेरक भाव ही प्रेम है।
प्रेरक शक्ति ही प्रेम है।
प्रेरक प्रकृति ही प्रेम है।
प्रेरक संस्कृति ही प्रेम है।
प्रेरक गुण संस्कार स्वभाव ही प्रेम है।
प्राण की सक्रियता ही प्रेम है।
प्राण की प्रवृत्ति ही प्रेम है।
प्राण का योग प्रेम है।
प्राण ऊर्जा की संवेदनशीलता ही प्रेम है।
प्राण ऊर्जा की सजगता ही प्रेम है।
संवेदना, साहस, श्रद्धा सद्वृत्ति ही प्रेम है।
सद्भाव ही प्रेम है।
सरलता, विनम्रता, उदारता, दयालुता, सम्बद्धता ही प्रेम है।
परस्पर संबंधो की अनुभूति ही प्रेम है।
परस्पर सहजीविता ही प्रेम है।
स्वीकारभाव ही प्रेम है।
दूसरों से अपनत्त्व की अनुभूति ही प्रेम है।
दूसरों से अनुराग, आसक्ति, मोह ही प्रेम है।
दूसरे में स्वयं का विलय ही प्रेम है।
सम्बन्ध ही प्रेम का प्रारम्भ है।
समर्पण ही प्रेम का शिखर है।
अहंकार का पिघलना ही प्रेम का फल है।
दम्भ का समापन ही प्रेम की विजय है।
स्व का पर में विलय ही प्रेम का शुभारम्भ है।
स्व का सर्व में विलय ही प्रेम की पूर्णता है।
मित्रता का प्रारम्भ और शत्रुता का अंत ही प्रेम है।
दूसरों के लिये सुख और अपने लिए कष्ट की स्वीकारोक्ति ही प्रेम है।
सुख पाने के स्थान पर सुख देने की प्रवृत्ति ही प्रेम है।
सम्मान पाने के स्थान पर सम्मान देने की प्रवृत्ति ही प्रेम है।
सुरक्षा पाने के स्थान पर सुरक्षा देने की प्रवृत्ति ही प्रेम है।
प्रेम पारिवारिक धर्म है।
प्रेम दार्शनिक सत्सिद्धांत द्वारा प्रशस्त सनातन धर्म है।
प्रेम ही समस्त सुखों का एकमात्र कारण है।
प्रेम जागे बिना किसी भी व्यक्ति को कोई सुखानुभूति नहीं हो सकती।
जहां-जहां और जिस-जिस व्यक्ति या वस्तु से प्रेम है वहीँ-वहीं उस-उस व्यक्ति या वस्तु के संपर्क में सुख की अनुभूति होती है।
जितना अधिक प्रेम उतना अधिक सुखानुभूति होती है।
प्रेम की त्वरा और तीव्रता पर ही सुख की न्यून या अधिक मात्रा अनुभव होती है।
हृदय में प्रेम विकसित हुए बिना संसार में किसी भी व्यक्ति को किसी भी उपाय से “सुख-सुरक्षा-सम्मान” की तृप्ति उपलब्ध नहीं होती।
प्रेम जितना अधिक होगा सुख की अनुभूति भी उतनी अधिक होगी।
किन्तु तुम्हारे मिटे बिना तुम्हारा प्रेम जागता नहीं।
जीते जी मर जाना और मरकर भी जीवित रह जाना ही प्रेम है।
प्रेमधर्म के इस रहस्य को जो जानता है वह धन्य है इस संसार में।
–राम गुप्ता, स्वतंत्र पत्रकार, नोएडा