भूख के हिस्से की ईमानदारी सदा रेहन पर रहती है

इस देश की विविधता की भी अपनी कहानी है। यहाँ व्यक्ति के स्तर से विद्यालय तय होते हैं। बहुत से अध्यापक अपने अध्यापनकार्य पर ही विश्वास नहीं करते; जिसके कारण उनके बच्चे कान्वेंट स्कूल में जाने के लिए मजबूर होते हैं। बच्चे खुद अपने दोस्तों व अपने कक्षाध्यापक से कहते हैं कि मेरे मम्मी या पापा सरकारी स्कूल मे पढ़ाते हैं पर न वहाँ पढ़ाई होती है न वो खुद पढ़ाते हैं, इसलिए वे मुझे आपके स्कूल में भेजते हैं। जो बच्चे बड़े भाग्यशाली होते हैं वो ही अपने प्रिय मम्मी-पापा के साथ उनके स्कूल जाते होंगे और उनके अनुशासन, सदाचार, कर्त्तव्यपालन, के साथ-साथ पढ़ाते व सिखाते हुए देख पाते होंगे।

एक मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री कहाँ-कहाँ दृष्टि रख सकते हैं? यह विचारणीय है। दृष्टि रखने के लिए विभागानुसार नीतिनियन्ता, सचिव, सलाहकार आदिक रखे जाते हैं। इन्हीं लोग की सलाह से सरकारी स्कूलों के लिए भी व्यवस्था बनायी जाती है। पहले विद्यालय मे पुस्तक के साथ स्कूल की पोशाक भी मिलती थी, जिसमे बहुत लोग की भूख हावी हो गई थी पर स्कूल के सभी बच्चे अच्छे या खराब कपड़े पहनकर स्कूल आते थे, लेकिन स्कूल की पोशाक में आते थे। पर भूख को देखकर नीतिनियन्ताओं ने तय किया कि बच्चों के अभिभावक के बैंक खाते मे स्कूल की पोशाक का पैसा भेजा जाएगा। उनके हिसाब से नीति अच्छी थी, पर अब बच्चों के अभिभावक की भूख हावी हो गई; जिसके कारण बच्चे बिना स्कूल पोशाक के विद्यालय आ रहे हैं। इन्हें देखकर अधिकारीगण स्कूल के अध्यापक को जिम्मेदार बता रहे हैं। अब इनका क्या दोष है यह किससे पूछा जाए?

अभी तक विद्यालय में पुस्तक नहीं आयीं और पढ़ाई अप्रैल से चल रही है; यह किस अधिकारी से पूछा जाना चाहिए?             योजनाओं मे चूना लगाने का कार्य करने वाले अधिकारियों के कारण भूत, वर्त्तमान व भविष्य में "सब धान बाईस पसेरी" ही रहा है। कोई मूलभूत बदलाव नहीं हुआ। अयोग्य अधिकारी, बड़ेबाबू व लिपिक को सीधे दक्षिण भारत स्थानांतरित कर देना चाहिए। इसी बहाने भारत-दर्शन का लाभ भी मिलेगा। दक्षिण भारत पर आज भी श्रीलंका की ईमानदारी का असर है। श्रीलंका की उथल-पुथल तो सब देख ही रहे हैं; साथ ही वहाँ की देशभक्ति को भी! ईमानदारी इतनी कि दो करोड़ रुपये गिनकर देश को वापस दे दिये। वहाँ भी भूख है। पर अपने यहाँ की भूख से अलग।

—डॉ० सर्वेश कुमार मिश्र
जयपुर, राजस्थान