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एक अभिव्यक्ति : इल्ज़ाम सिर पर है मेरे, क़ातिल नहीं, फ़रार हूँ

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-


जो उजड़ गया वह दयार हूँ,
जो बिछड़ गया वह प्यार हूँ।
कुछ याद आये तो कहो,
जो बिसर गया वह क़रार हूँ।
इल्ज़ाम सिर पर है मेरे,
क़ातिल नहीं, फ़रार हूँ।
नींदें जो उनकी उड़ा गयी,
वह आवारा मैं बयार हूँ।
चल पड़ा लुटा, ख़ुद कहीं,
वह दीवाना मैं निगार (प्रेमी) हूँ।
जो रंगे नूर है दिख रहा,
वह फ़स्ले मैं बहार हूँ।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २ जुलाई, २०१८ ईसवी)

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