जीवन का सारांश : पति-पत्नी-संवाद

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


पत्नी :
सम्बल अपनी बाँह का, कभी न देना छोड़।
कितना भी संकट रहे, दु:ख से करना होड़।।
हर जन्म हम संग चलें, ऐसी अपनी चाह।
खटपट भी होता रहे, अलग न होगी राह।।
पति :
मीत! मन में हो तुम्हीं, बन जीवन-आधार।
अर्द्ध अंग बनकर रही, सदा उठाया भार।।
जीवन-वृत्त अनूप है, नहीं ठनेगी रार।
वक्ता भावी हूँ नहीं, कैसे कह दूँ सार।।
पत्नी :
पति-पत्नी के प्रेम का, कहीं नहीं है जोड़।
सप्तपदी की गाँठ का, नहीं दिखे है तोड़।।
मानव अवगुण से भरा, फिर भी बहुत महान्।
जीवन-रस पीता सदा, गुण-अवगुण पहचान।।
पति :
मंज़िल पास न आ सके, संग-संग हम संग।
मन-दुर्बलता दूर रहे, छिटके कभी न अंग।।
प्राणप्रिये! मन में बसो, बाहर हैं सब तंग।
मन-से-मन मिलता कहाँ, सबके बदले रंग।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ५ अक्तूबर, २०१८ ई०)