पथिक! बोलो

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

पथिक !
परिचित पड़ाओं की प्रतीक्षा
कब तक सहते रहोगे?
अपरिचित राहें होतीं
तो पाँवों के छाले
यों शिकायत नहीं करते।
मरहम की तलाश में भटकना
कब भूल पाओगे?
भिखारिन पगडण्डियों पर
किसी पहचानी क़दमों की आहट
जब-जब तुम्हारे कानों से
अठखेल करेंगी,
तुम्हारे बूढ़े ज़ख़्म
जवानी की दहलीज़ से
आ टकरायेंगे।
तुम तो जीवन-यात्रा के पाथेय हो?
किसी ‘अपरिचित’ मोड़ से
सौदा कर लो;
शायद बात बन जाये।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १२ जून, २०२० ईसवी)