प्रकृति मौन दिखती अभी, भरता पाप का घट

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
नफ़्रत की है आग लगी, घी डालें हर ओर।
महँगाई डायन दिखे, कोई ओर न छोर।।
दो–
कैसा अनुरागी बना, जनता पूजे पाँव।
हरियाली बीहड़ बनी, उजड़ रहा हर गाँव।।
तीन–
मक्कारी हर सू दिखे, दिखे धूर्त्त-सा पाँव।
शातिर गिरगिट-रंग है, छीने मन की छाँव।।
चार–
सूरत बदले हर पहर, सीरत एक-समान।
चाल चले शातिर यहाँ, लेकर हाथ कमान।।
पाँच–
लूट रहा है देश को, बाँट अफ़ीमी मन्त्र।
अंकुश उस पर है नहीं, सरकारी है तन्त्र।।
छ:–
प्रकृति मौन है दिख रही, भरता पाप अघोर।
पाप घड़ा का जब भरे, कभी न होगी भोर।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २९ मई, २०२२ ईसवी।)