मा! मौन को चीरो

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

कौन-सा अपराध!
कैसी गुस्ताख़ी!
मै तो था,
मात्र मास का एक लोथड़ा।
शक़्ल इख़्तियार करने से पहले ही
मेरे वुजूद को मिटा डाला?
तुम ‘ममत्व’ और ‘अपनत्व’ के
अन्तर्द्वन्द्व में उलझी रही;
पिता लोक-लज्जा का स्मरण कराते हुए,
तुम्हें बाध्यता और लाचारी के गह्वर मे पैठाकर,
‘कुन्ती’ और ‘गंगा’ का आख्यान सुनाते रहे
और तुम किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी बनी,
सम्मोहित होती रही।
मा!
तुम्हारी गोद इतनी अशक्त हो चुकी थी,
जो यह अबोध आश्रय न पा सका?
वात्सल्य और ममता की चादर
मैली क्यों होती रहीं मा?
विमूढ़ हूँ वा अक़्लमन्द
समझ नहीं पाता?
तुम्हें माता कहूँ; विमाता कहूँ
वा कुमाता कहूँ ?
बोलो! चुप क्यों?
मा! मौन को चीरो;
अपने और मेरे ‘होने’ को सिद्ध करो।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १५ जून, २०२२ ईसवी।)