ब्रह्म सनातन एक है, जीव क्षणिक है रूप

एक–
कोण दृष्टि का बदलकर, लक्ष्य करो संधान।
आडम्बर को त्यागकर, कर लो ग्रहण अपान (आत्मज्ञान)।।
दो–
कौन सनातन है यहाँ, क्षणभंगुर है कौन?
न्यायी दिखता कौन है, अधिनायक है कौन?
तीन–
ब्रह्म सनातन एक है, जीव क्षणिक है रूप।
क्रीतदास न्यायी दिखे, अधिनायक है भूप।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २२ अक्तूबर, २०२४ ईसवी।)