पेशे ख़िदमत हैं, चन्द अश्आर
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-
एक :
तुम्हारी क्या बिसात, जो मुझे ललकारोगे?
शब्द-तीर चलने पर, शेर भी दहल जाते हैं।
दो :
कुछ कर सकने की औक़ात नहीं, तो चुप बैठो,
शेर की खाल तो, गीदड़ ओढ़ा करते हैं।
तीन :
कुछ लोग माचिसभरी डिबिया लेकर, मुझे जलाने आये हैं,
मैं ज्वालामुखी के मुहाने पर, खटिया बिछा कर सोता हूँ।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ११ जुलाई, २०१८ ईसवी)