कविता- भावनाओं का मोल

अलका जैन, रानीपुर (झांसी, उ. प्र.)

भावनाओं का मोल नहीं है 
रिश्तों के बाजार में,
अपने ही अपनों को डुबोते
लाकर के मझधार में।

ना सावन में झूले पड़ते
राखी में अब प्रेम कहां
दीपावली ना जगमग होती
होली में हुड़दंग कहां
रौनक सारी ओझल हो गई 
तीज और त्यौहार में ।

ना लोरी ना दादी-नानी
ना बच्चों का बचपन है
जीवन ऐसा बना है अब तो 
ज्यो रेशम की उलझन है
मन कोई अब नहीं भीगता
वर्षा की बौछार में।

रिश्ते हैं यह ओस की बूंदें,
पड़ी दिखी और सूख गयीं
आंसू पी-पी कर यह आंखें
लगता जैसे सूख गई
ऐसा लगता चुन गई खुशियां
दर्दों की दीवार में।

रिश्तों की इस भीड़ में अब तो
हर इंसान अकेला है
सुकून मिले जहां दिल को प्यारे
बस समझो वह मेला है
रूखापन और मजबूरी बस
रह गई अब व्यवहार में।