डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-
सच तो यह है कि तथाकथित धर्मानुरागी ‘प्रार्थना’ का वास्तविक अर्थ जानते ही नहीं। मनुष्य जैसे ही आत्म-केन्द्रित अथवा परिवार-केन्द्रित अभिलाषा और आकांक्षा की पूर्ति के लिए हाथ जोड़ता है, उसकी प्रार्थना की शक्ति क्षीण हो जाती है।
उदाहरण के लिए, आप एक करोड़ लोग को अपने इष्ट की प्रार्थना करने के लिए उनके उपासना-स्थल पर बैठा दीजिए; मेरा दावा है कि उनमें से एक भी व्यक्ति ‘मन की शक्ति’ के साथ ‘स्थितिप्रज्ञ’ होकर प्रार्थना नहीं कर सकेगा; क्योंकि प्रार्थना की अवधारणा क्या है, लोग इसे नहीं समझते।
यही कारण है कि अब अर्चना और आराधना यान्त्रिक हो चुकी है और धर्मानुरागी परमुखापेक्षी हो चुकी है। मोबाइल का एक बटन दबाइए; वे सभी मन्त्र, प्रार्थना, भजनादिक बजने लगते हैं और लोग आँखें मूँदकर घण्टी बजाने लगते हैं। इतना ही नहीं, एक फ़ोन करने पर ‘श्री रामचरितमानस’ का तथाकथित ‘अखण्ड रामायण’ (शुद्ध प्रयोग ‘श्री रामचरितमानस का अखण्ड पाठ’ है।) करनेवाले ‘किराये’ पर उपस्थित हो जाते हैं और गृहस्वामी बत्तीसी निकाल कर ‘आतिथेय’ की भूमिका में स्वयं को प्रस्तुत करता है। वह एक अलग बैठकख़ाने में अपने अतिथियों को ले जाता है, जहाँ वे ठण्ढा-गरम का भोग लगाते हैं; ताम्बूल, तम्बाकू आदिक का भी दौर शुरू हो जाता है। उसके बाद देश की सियासत की गरमी उस घर के दरो दीवार में घुसने लगती है; ठहाकों की गठरी खुलने लगती है। इस तरह से आतिथेय अपने प्रार्थना-भाव को प्रकट करता है।
उधर, भाड़े के कथित ‘अखण्ड रामायण’ की मण्डली के लोग भी निर्धारित अवकाश में ताम्बूल और तम्बाकू, चाय-समोसे का सेवन करते हैं, फिर खण्डित ‘अखण्ड रामायण’ का गान करते रहते हैं।
यह है, प्रार्थना की वास्तविकता, आप माने अथवा न माने।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २१ जनवरी, २०२० ईसवी)