“अध्यापक-अध्यापिकाओँ को उच्चारण और लेखन-स्तर पर स्वयं को साधना होगा”– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की 'बलिया' मे अनौपचारिक भाषिक कर्मशाला


विगत दिवस राजकीय बालिका गर्ल्स इण्टर कॉलेज, बाँसडीह (बलिया) मे व्याकरणवेत्ता और भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की एक अनौपचारिक भाषिक कर्मशाला आयोजित हुई। खेद का विषय है कि उस विद्यालय मे कक्षा छ: से बारहवीँ तक की कुल चालीस छात्राओँ ने प्रवेश लिया है, जिनके लिए प्रधानाचार्य-सहित कुल चार शिक्षिकाएँ ही हैँ। उस विद्यालय की अनुशासित प्रधानाचार्य प्रीति गुप्ता-सहित अन्य विषयोँ की शिक्षिकाओँ ने उस कर्मशाला मे सक्रिय सहभागिता की थी, जोकि उन्हीँ के लिए थी। उन चारोँ मे प्रीति गुप्ता, योगिता यादव, रीना यादव तथा कुमारी छाया शामिल थीँ। आचार्य ने उनकी सीखने और समझने के प्रति ललक और जिज्ञासा का बोध करते हुए, उन्हेँ कई शब्द लिखने और शुद्ध करने के लिए दिये थे, जिनमे प्रत्युत्पन्नमति, शुश्रूषा, अनिर्वचनीय इत्यादिक थे। उन्होँने बार-बार ‘सर-मैम-मैडम’ शब्दोँ का प्रयोग सुनकर कहा, “आप सब ‘महोदय और महोदया’ का सम्बोधन किया करेँ। आप यदि मुझे ‘सर’ की जगह ‘महोदय’ का सम्बोधन करेँगी तो ही बताऊँगा।”

इसी अवसर पर आचार्य ने सबसे आवेदनपत्र की आरम्भिक पंक्तियाँ लिखने के लिए कहा और पूछा। सबने ”महोदय, सविनय निवेदन है कि….” लिखा और बताया, फिर आचार्य ने संशोधन करते हुए बताया, “आप सब ‘महोदय’ शब्द मे अल्प विरामचिह्न का प्रयोग न करके, ‘सम्बोधनचिह्न’ का करेँगी; क्योँकि इस महोदय-प्रयोग मे सम्बोधन है। उन्होँने यह भी बताया, “जब निवेदन शब्द का प्रयोग है तब उससे पहले ‘सविनय’ लगाने का कोई औचित्य नहीँ है; क्योँकि निवेदन मे ही विनम्रता है।” जब प्रधानाचार्य प्रीति गुप्ता ने पूछा, “हम अन्त मे ‘निवेदिका’ शब्द का प्रयोग कर सकते हैँ?” आचार्य ने कहा, “बिलकुल”। फिर हिन्दी-शिक्षिका कुमारी छाया ने ‘भवदीय’ शब्द के प्रयोग पर प्रश्न किया, फिर आचार्य ने उस शब्द का व्याकरणिक व्याख्या करते हुए, उसके उपयुक्त प्रयोग को समझाया।

इसके अतिरिक्त आचार्य ने परीक्षा-परिक्षा, व्यंग्य-व्यंग, अन्तर्राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय इत्यादिक शब्दोँ को लिखने और उनमे कौन-सा शब्द अशुद्ध है और कौन-सा शुद्ध है, इसे बताने के लिए कहा था। चूँकि उन चारोँ के लिए परिक्षा, व्यंग, अन्तरराष्ट्रीय इत्यादिक शब्द बिलकुल नये लग रहे थे इसलिए वे इन शब्दोँ के प्रति सहज नहीँ दिखीँ। यही कारण है कि वे समस्त सहभागिनियाँ उत्तर देने मे समर्थ नहीँ रहीँ। आचार्य ने उन सारे शब्दोँ को, जिनका अशुद्ध लेखन और वाचन किया गया था, सकारण समझाते हुए, उनका उच्चारण और लेखन किया और अर्थ भी बताया।

इसी अवसर पर आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने वर्णमाला के अन्तर्गत आनेवाले स्पर्शी व्यंजनो और अक्षरोँ का लेखन और उच्चारण सिखाया। उन्होँने बताया कि अक्षरोँ का उच्चारण करते समय ‘अल्पप्राण’ और ‘महाप्राण’ की उपेक्षा नहीँ की जा सकती। उन्होँने दोनो प्राण से युक्त करके स्पर्शी वर्णोँ का उच्चारण कैसे किया जायेगा, सिखाया। उन्होँने यह भी कहा, “पंचमाक्षरोँ का उच्चारण हर कोई नहीँ कर सकता। इसके लिए अनुस्वार के नियम से अवगत होना होगा।”

आचार्य ने ‘कवर्ग से लेकर पवर्ग’ के पंचमाक्षरोँ का उच्चारण करके बताया। उन्होँने संयुक्ताक्षर ‘क्ष’ का उच्चारण कराया और बताया, ”चूँकि क्ष वर्ण की रचना क् और ष के योग से होती है अत: उच्चारण करते समय क् और ष की ध्वनि संयुक्त रूप से निकलनी ही चाहिए।

आचार्य ने प्रधानाचार्य प्रीति गुप्ता से पूछा, “आप प्रधानाचार्य हैँ वा प्रधानाचार्या?” तब उन्होँने उत्तर दिया, “प्रधानाचार्या”। फिर आचार्य ने बताया, “पदनाम सदैव पुंल्लिंग मे ही रहता है।” प्रधानाचार्य ने बताया, ”वहाँ (शिक्षाविभाग) से प्रधानाचार्या ही लिखकर आता है।”

व्याकरणवेत्ता और भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “देश के समस्त राज्योँ मे ऐसा कोई राज्य नहीँ है, जहाँ के किसी स्तर की एक भी शिक्षणसंस्था/संस्थान मे शुद्धतापूर्वक श और ष का उच्चारण किया जाता हो। चूँकि यह भोजपुरी-क्षेत्र है इसलिए यहाँ भाषा पर बोली का प्रभाव दिखता है इसलिए आप सबको उच्चारण-स्तर पर स्वयं को साधने के लिए गहन अध्यवसाय करना होगा।”
अन्त मे, प्रधानाचार्य प्रीति गुप्ता ने आभार-ज्ञापन किया।