आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

यहाँ एक शब्द है, खेल। इसी शब्द से दो शब्द का सर्जन (‘सृजन’ अशुद्ध शब्द है।) होता है :―
१– खिलाड़ी
२– खेलाड़ी।

इनमे से कौन-सा शब्द उपयुक्त है और क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं, दोनो शब्द उपयुक्त हों। ऐसी स्थिति मे, दोनो का अर्थ ‘एक’ ही है वा ‘भिन्न-भिन्न’ है?
◆ सकारण उत्तर―
यहाँ पर दो शब्द हैं :―
(१) खिलाड़ी
(२) खेलाड़ी।

यहाँ हम सुस्पष्ट कर दें कि ‘खेल’ शब्द से ‘खेलाड़ी’ शब्द की उत्पत्ति होती है, न कि ‘खिलाड़ी’ की।

अब हम दोनो शब्दों पर क्रमश: विचार करते हैं। प्रथम शब्द ‘खिलाड़ी’ है। ‘खेलनेवाला’ के अर्थ मे यही शब्द प्रचलित है, जिसका सभी व्यवहार करते आ रहे हैं। हम जब इस ‘खिलाड़ी’ शब्द मे प्रयुक्त सभी अक्षरों पर विचार करते हैं और इसमे प्रयुक्त हिन्दी-प्रत्यय को खंगालते हैं तब ज्ञात होता है कि पूर्णत: प्रचलन मे रहने के कारण इसे अभी तक अस्वीकार नहीं किया गया है, जबकि ‘खिलाड़ी’ शब्द निरर्थक है। सभी शब्दकोश (‘कोशों’ अशुद्ध है।) मे ‘खिलाड़़ी’ है और ‘खेलाड़ी’ भी। जिस प्रकार कूड़े के ढेर मे अनुपयोगी और उपयोगी वस्तुएँ डाल दी जाती हैं उसी प्रकार से शब्दकोश मे भी निरर्थक और सार्थक शब्द संगृहीत (‘संग्रहित’, ‘संग्रहीत’ तथा ‘संगृहित’ शब्द अशुद्ध हैं।) किये गये हैं। ऐसा एक भी शब्दकोश नहीं है, जिसमे कोशकार ने स्वविवेक से शब्दों का सार्थक मानकीकरण करते हुए, उपयुक्त शब्दों को ही स्थान दिया हो।

हमे समझना होगा कि मूल शब्द ‘खेल’ है, न कि ‘खिल’; क्योंकि ‘खेलनेवाला’ के अर्थ मे सर्वप्रथम ‘खेल’ शब्द है, जो कि संस्कृतभाषा/संस्कृत-भाषा/संस्कृत की भाषा/ सम्स्कृतभाषा/सम्स्कृत-भाषा (‘संस्कृत भाषा’/ ‘सम्स्कृत भाषा’ अशुद्ध है।) का शब्द है, जिसके ‘लट् लकार’ के प्रथम पुरुष के धातुरूप हैं :― खेलति (एक व्यक्ति खेलता है।) खेलत: (दो व्यक्ति खेलते हैं।) खेलन्ति (तीन अथवा तीन से अधिक व्यक्ति खेलते हैं।)। यहाँ ‘खिलति खिलत: खिलन्ति’ का प्रयोग नहीं किया गया है; क्योंकि यह प्रयोग अशुद्ध है। ‘खेल’ नपुंसकलिंग का संज्ञा-शब्द है, जिसके शब्दरूप हैं :― खेलम् खेले खेलानि। इसके स्थान पर ‘खिलं खिले खिलानि’ का व्यवहार नहीं किया जाता।

स्त्रीलिंग का एक शब्द है, ‘खेलनि’, जिसका अर्थ ‘खेल’ होता है। इसी ‘खेलनि’ को जब हम ‘खेलनी’ लिखेंगे तब इसका अर्थ बदल जाता है। पुंल्लिंग-शब्द ‘खेलनी’ का अर्थ ‘शतरंज का खेलाड़ी’ हो जाता है और इसी ‘खेलनी’ शब्द का स्त्रीलिंग मे प्रयुक्त होने पर इसका अर्थ ‘किसी वस्तु से खेला जानेवाला खेल’ हो जाता है। इसी ‘खेल’ शब्द के अन्त मे ‘वाड़ी’ प्रत्यय का प्रयोगकर, ‘खेलवाड़ी’ शब्द की रचना होती है, जिसका अर्थ ‘प्राय: खेलवाड़ करनेवाला’ है। इसी ‘खेल’ शब्द से ‘खेलवार’ शब्द भी बनता है; जैसे― गम्भीर रहो; पढ़ाई के साथ खेलवार (खेलवाड़) मत करो। गोस्वामी तुलसीदास ने ‘खेलवार’ शब्द को अपनी काव्यकृति ‘कवितावली’ मे ‘घनाक्षरी’ छन्द मे इस तरह से प्रस्तुत किया है, “मानो खेलवार खोली सीस ताज बाज की।” ‘खेला’ शब्द भी ‘खेल’ की ही देन है। ‘खेल्’ धातु मे ‘अ’ और ‘टाप्’ प्रत्यय के योग से ‘खेला’ का अस्तित्व उभरता है। ‘किसी को खेलने के लिए प्रवृत्त करना’ के अर्थ मे ‘खेलाना’ का प्रयोग किया जाता है, जो कि हिन्दीशब्द/हिन्दी-शब्द (‘हिन्दी शब्द’ अशुद्ध है।) ‘खेलना’ की प्रेरणार्थक क्रिया है। इसी शब्द से उपयुक्त शब्द ‘खेलौना’ की रचना होती है, जबकि अति प्रचलित ‘खिलौना’ शब्द अनुपयुक्त है। आज भी गाँवों मे ‘खेलौना’ का ही व्यवहार होता है; जैसे― हे बुचिया के एगो खेलौना दे द। (इस बच्ची को एक खेलौना दे दो।)
इस ‘खेल’ शब्द के अन्त मे हिन्दी-प्रत्यय ‘आड़ी’ जुड़ा हुआ है, जिससे सार्थक शब्द ‘खेलाड़ी’ का सर्जन (‘सृजन’ अशुद्ध और निरर्थक शब्द है।) होता है। इसी ‘खेल’ शब्द से ‘खेलक’ शब्द की भी रचना होती है, जिसका अर्थ ‘खेलाड़ी’ होता है। ‘खेल’ से ‘खिलक’ शब्द की रचना नहीं होती। दो अन्य शब्द ‘खेलन्दर’ और ‘खेलन्दरा’ भी हैं, जिनमे से ‘खेलन्दर’ संज्ञाशब्द है, जिसका अर्थ ‘खिलाड़ी’ है। इसी का दूसरा शब्द विशेषण है, जिसका अर्थ ‘खेलवाड़ करने वाला’ है। ‘खिलन्दर’ और ‘खिलन्दरा’ का प्रयोग नहीं होता। ‘खेलाड़ी’ शब्द के अनुमोदन मे एक अन्य शब्द ‘खेलारी’ भी है, जिसकी पुष्टि गोस्वामी तुलसीदास अपनी कृति ‘श्री रामचरितमानस’ के माध्यम से करते हैं, “चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू।” ‘

‘खेल’ संज्ञा-शब्द है और जब हलचिह्नसहित इसी शब्द को खेल्’ लिखा जाता है तब यह धातु-रूप मे ‘खेलना’ का अर्थ प्रकट करता है। ‘खेल’ शब्द के अन्त मे हिन्दीप्रत्यय/ हिन्दी-प्रत्यय (‘हिन्दी प्रत्यय’ अशुद्ध है।) ‘वाड़’ के योग से ‘खेलवाड़’ शब्द का गठन होता है, न कि ‘खिलवाड़’ का।

यदि कोई ‘खिलाड़ी’ शब्द की व्युत्पत्ति को आधार मानता है तो अपनी मान्यता के लिए उसके पास कौन-सा व्याकरणिक तर्क है? वह इस प्रश्न का उत्तर दे नहीं पाता।
‘खिलाड़ी’ शब्द को सही बतानेवाला व्यक्ति यदि यह कहे कि ‘खिल’ शब्द के अन्त मे ‘आड़ी’ के जुड़ने से ‘खिलाड़ी’ बनता है तो ऐसे मे, प्रश्न उभरेगा― ‘खिल’ का अर्थ ‘खेल’ है? उत्तर मिलेगा― नहीं। इस प्रकार यह सिद्ध हो जायेगा कि ‘खिलाड़ी’ शब्द निरर्थक है। ‘खिल’ का अर्थ होता है, ‘धन्नी’, ‘अर्गल’। ये दोनो ही ‘खेल’ के समानार्थक शब्द नहीं हैं।

पुंल्लिंग-शब्द ‘खेलाड़ी’ से स्त्रीलिंग-शब्द ‘खेलाड़िनी’ का सर्जन होता है, न कि ‘खिलाड़िन’ और ‘खिलाड़िनी’ शब्द का; जैसे पुंल्लिंग-शब्द ‘अपराधी’ का स्त्रीलिंग-शब्द ‘अपराधिनी’ होता है।

यदि ‘खेलनेवाले’ को ‘खेलाड़ी’ कहा जायेगा तो उसी आधार पर ‘खिलनेवाले’ को भी ‘खिलाड़ी’ कहा जाना चाहिए, जबकि ऐसा नहीं कहा जाता।

अब, आप उन शब्दप्रयोग को समझें, जिनका हमारे समाज मे व्यवहार होता आ रहा है :―
१– वह बहुत बड़ा ‘खेलाड़ी’ है।
२– उसके साथ ‘खेलवाड़’ मत करो।
३– उन लोग (‘लोगों’ अशुद्ध है।) के लिए ‘खेल-खेलवना’/’खेलौना’ की व्यवस्था कर दो।
४– मेरे बच्चे को ‘खेलाओ’।
५– हमे ‘खेलने’ दो।
६– उसे कम मत समझो; बहुत बड़ी ‘खेलाड़िनी’ है।
७– उसे इस बार अपने दल की ओर से ‘खेलवाना’ है।

◆ ‘आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ नामक प्रकाशनाधीन कृति से सकृतज्ञता/साभार गृहीत (ग्रहण किया गया/लिया गया।)

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २२ फ़रवरी, २०२३ ईसवी।)