● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
मोदी हटाओ-देश बचाओ’― यह नारा ‘अपशब्द’ कैसे हो गया और उस पर दिल्ली-पुलिस-प्रशासन की तत्परता ग़ज़ब ढा रही है। जयप्रकाश नारायण की ‘समग्र क्रान्ति’ के समय नारा लगाया जाता था :― ‘इन्दिरा हटाओ-देश बचाओ’। जब राजीव गांधी का ‘बोफ़ोर्स-प्रकरण’ को लेकर उग्र विरोध किया गया था तब नारा लगाया गया था :― ‘राजीव हटाओ-देश बचाओ’। उक्त स्थितियों मे उन नाराओं को लेकर न तो इन्दिरा गांधी ने अपने पुलिस-तन्त्र के द्वारा किसी विपक्षी नेता पर एफ० आइ० आर० दर्ज़ करने का दबाव बनाया था और न ही राजीव गांधी ने।
आश्चर्य का विषय है कि नरेन्द्र मोदी-सरकार मे ‘मोदी हटाओ-देश बचाओ’ नारे को लेकर १०० राजनैतिक लोग के विरुद्ध एफ० आइ० आर० दर्ज़ कराये गये हैं और ६ लोग बन्दी बनाये गये हैं। विचारणीय और शोचनीय है कि नरेन्द्र मोदी किसी को ‘अशोभनीय’ बात कह दें तो वह ‘अमृत वाक्य’ हो जाता है और वहीं यदि कोई अन्य व्यक्ति नरेन्द्र मोदी को ‘कुछ’ कह दे तो वह ‘विष वाक्य’ हो जाता है। इस कारण के मूल मे अहम्मन्यता की लहलहाती फ़स्ल दिख रही है, जिसे काटो तो गुनाह; न काटो तो गुनाह।
अब प्रश्न है, उक्त नारे मे ऐसा कौन-सा अपशब्द है, जिसे आधार बनाकर कथित कृत्य कराये गये हैं। आश्चर्य का विषय है कि दिल्ली मे प्रतिरात्रि और प्रतिदिन न जाने कितने जघन्य कृत्य किये जाते रहे हैं और दिल्ली-पुलिस-प्रशासन आज भी ख़ाली हाथ है।
यहीं पर ‘अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता’ भी संकट मे दिखती आ रही है। हम यदि शालीनतापूर्वक कुछ गम्भीर घाव करनेवाले शब्दों के साथ किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति स्वयं को अभिव्यक्ति करते हैं, जो सत्तापक्ष का सर्वोपरि चेहरा है तो कौन-सा अपराध करते है?
हमारी देश की संसद् इन दिनो एक ‘हास्यास्पद’ विषय को लेकर पूरी तरह से निष्क्रिय है, जिसका संचालन कराना सरकार का दायित्व है और उसी सरकार के कुछ निरंकुश और मनबढ़ लोग यदि संसद् के दोनो सदनो को अपने कुकृत्य को छिपाने के लिए उसका संचालन नहीं कराना चाहते हैं तो सरकार का मुखिया दोषी कहलायेगा ही। हमारे देश की जनता के करोड़ो रुपये संसद् के लक़्वाग्रस्त हो जाने के कारण व्यर्थ हो चुके हैं। कौन है इसके लिए उत्तरदायी? ऐसे मे, हम यदि कहते हैं :― ‘मोदी हटाओ-देश बचाओ’ तो कौन-सा अपराध करते हैं?
विपक्ष के प्रमुख व्यक्ति राहुल गांधी स्वयं पर लगाये गये आरोपों के विरुद्ध अपने वक्तव्य प्रस्तुत करने के लिए लोकसभा के स्पीकर से लगातार समय माँगते आ रहे हैं और राजनैतिक प्रभुता और हस्तक्षेप (‘हस्ताक्षेप’ अशुद्ध है।) के कारण उन्हें समय नहीं दिया जा रहा है। राहुल गांधी को निराधार तरीक़े से दो वर्षों के कारावास का दण्ड सुनाना, कहाँ तक उचित है, यद्यपि तत्काल ज़मानत ली जा चुकी है। क्या यह एक सांसद के अधिकार के साथ बर्बरतापूर्ण किया जानेवाला कृत्य नहीं है?
नरेन्द्र मोदी और उनके लोग सफलता मिलने पर ‘रोड-शो’ और ‘विजययात्रा’ निकालते हैं; परन्तु विफलता पर ‘शोकगायन’ करने से भी डरते हैं। यह जो दो प्रकार का चरित्र दिख रहा है, अतीव भयावह है।
आज देश मे ‘संकट’ और ‘संत्रास’ का वातावरण बना दिया गया है :― जिसका चाहो, घर गिरा दो; जिसके विरुद्ध चाहो, मनमाना एफ० आइ० आर० करा दो; जिसे चाहो, जेल के भीतर ठूँस दो। ऐसे मे, प्रश्न है, हम कब तक सरकार के संगीनी सायों तले जीते रहेंगे? यदि सच को ‘सच’ की तरह से कहना अपराध है और सच को सुनने की सामर्थ्य नहीं है तो हमे मार डालो।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ मार्च, २०२३ ईसवी।)