उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मौन क्यों?

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

उत्तरप्रदेश मे बहुरुपियों की चुनावी सभा मे लाखों लोग को ‘साम-दान-दण्ड-विभेद’ नीति के द्वारा इकट्ठा किया जा रहा है। कहीं कोई शारीरिक दूरी नहीं और मुखरक्षिका भी नहीं। ख़ुद को ‘न्यू इण्डिया’ का शासक कहनेवाला उद्घाटनबाज़ नेता नंगी आँखों से सब कुछ देख रहा है; परन्तु मौन है; क्योंकि वह सिर्फ़ ‘सत्ता की राजनीति’ करता आ रहा है; विपक्षी दलों के प्रमुख नेता देख रहे हैं; गणतन्त्र भारत का राष्ट्रपति देख रहा है; किन्तु यहाँ पर सभी की ज़बान लक़्वाग्रस्त हो चुकी है। वे सरकारी कुत्ते, जो जनसामान्य के मुखरक्षिका न लगाने पर लाठियों से मारते आये हैं, लाखों की चुनावी भीड़ के सामने ‘दुम’ हिलाते नज़र आ रहे हैं। यह ‘दोगली शासकीय-प्रशासकीय’ नीति आख़िर कब तक चलती रहेगी?

हमारे-आपके मोबाइल फ़ोन पर ‘कोरोना’ के संदर्भ मे भाषणबाज़ी करनेवाला चाटुकार अमिताभ बच्चन अन्धा-बहरा-गूँगा-लँगड़ा अर्थात् सरकारी ‘दिव्यांग’ क्यों दिख रहा है? “पर उपदेस कुसल बहुतेरे” यहाँ पर विधिवत् चरितार्थ हो रहा है।

ऐसे मे, जनसामान्य की जीवनरक्षा के लिए एकमात्र सहारा उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ही दिखते हैं, जबकि वे भी ‘मौन’ दिख रहे हैं; अन्तत:, क्यों? ऐसा प्रतीत होता है, लाश का अम्बार फिर लगनेवाला है। ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ तो सुस्पष्ट दो-टूक कह देती है– कोरोना से मरनेवालों की कोई ‘लिस्ट’ नहीं बनायी गयी है।

देश के सभी राजनेता अपनी चुनावी जनसभाओं मे भीड़ बुलवाकर उसमे शामिल एक-एक जन को ‘कोविड’ का आहार बनाने के लिए ‘कृतसंकल्प’ हैं और लोग भी जानबूझकर ‘परवाना’ की भूमिका मे आ चुके हैं। वे तो मरेंगे ही, उनके संसर्ग-सम्पर्क मे जो भी आयेगा, उसका भी “रामनाम सत्य” होना तय है।

सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २८ दिसम्बर, २०२१ ईसवी।)