आँखों का पानी मर रहा आँखों के सामने

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

 


उठती है हर लहर आँखों के सामने ,
गिरती है हर लहर आँखों के सामने।
सभ्यता की अगुवाई बेहयाई कर रही,
आँखों का पानी मर रहा आँखों के सामने।
पाक़ीज़गी से उसने चिलमन उठा दिया,
गिरने लगी हया अब आँखों के सामने।
ज़माने की दुश्वारियों से कौन है बचा,
खूं के आँसू रुला रही आँखों के सामने!
इंसानियत का लहू अब पतला दिख रहा,
रिश्तों की दोगलाहट अब आँखों के सामने।
आओ! अब इस सवाल पर ग़ौर करें हम,
कब-कैसे-कहाँ चूक हुई आँखों के सामने।