आचार्य द्विवेदी की पचासीवीं पुण्यतिथि पर स्मृतिसभा का आयोजन
‘सर्जनपीठ’ के तत्त्वावधान मे ‘सारस्वत सदन’, अलोपीबाग़, प्रयागराज से ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की पचासीवीं पुण्यतिथि की पूर्व-संध्या मे ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के भाषाप्रयोग का वर्तमान’ विषयक एक आन्तर्जालिक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया था। आयोजन मे अध्यक्षता हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयागराज के प्रधानमन्त्री विभूति मिश्र ने की थी। दक्षिण हिन्दी-प्रचार समिति, मून्नार (केरल) के निदेशक अश्रुवन मेटांघी रेड्डी मुख्य अतिथि रहे।
अमरावती (आन्ध्रप्रदेश) से हिन्दी-साहित्यकार डॉ० एस० आर० सेवन् ने बताया– आचार्य द्विवेदी जी ने अपने साहित्य मे भाषा-शुचिता के प्रति जो सजगता दिखायी है, वह आनेवाली पीढ़ी का मार्ग प्रशस्त करती रहेगी। हमे कम-से-कम आचार्य जी के शब्दों का ही अर्थबोध के साथ प्रयोग आरम्भ कर देना चाहिए।
मुख्य अतिथि डॉ० अश्रुवन मेटांघी रेड्डी का कहना था– आचार्य द्विवेदी की भाषा खड़ी बोली हिन्दी थी। उन्होंने खड़ी बोली का प्रयोग करते समय शुद्ध शब्द के प्रति विशेष रूप से ध्यान दिया है, जबकि वर्तमान मे हिन्दी के बड़े-बड़े विद्वान् अशुद्ध लिखते आ रहे हैं।
अध्यक्ष विभूति मिश्र ने कहा– आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी अपने लेखन मे तत्सम शब्द-प्रयोग करने के पक्षधर थे। यही कारण है कि हिन्दी-साहित्य मे जब भी शुद्धता की बात आती है तब सर्वप्रथम आचार्य द्विवेदी की गणना होती है। वे तत्सम शब्दों का प्रयोग करते हुए चुटकी लेते हुए व्यंग्य भी कर जाते थे।
समारोह-संयोजक एवं संचालक भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया– साहित्य का क्षेत्र रहा हो वा पत्रकारिता का, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने व्याकरण एवं वर्तनी-अशुद्धियों पर विशेष बल दिया है। ‘रसज्ञ रंजन’, ‘अद्भुत आलाप, ‘साहित्य सीकर’, ‘साहित्य संदर्भ’ आदिक उनकी निबन्धात्मक कृतियाँ इस तथ्य को प्रमाणित करती आ रही हैं कि उत्कृष्ट शिल्पगत संस्कार यदि देखना हो आचार्य द्विवेदी की साहित्य-कुटिया मे पधारें।
सोलापुर (महाराष्ट्र) की विदुषी शिल्पा मेघना ने कहा– सच तो यह है कि हम लोग आचार्य द्विवेदी जी को भूलते जा रहे हैं, वर्ना उनकी साहित्य-साधना का अनुसरण करते हुए, अपने-अपने लेखन मे शुद्धता का प्रयोग कर रहे होते। चाहें बड़े-से-बड़ा साहित्यकार हो; पेपर-मैग्ज़ीन हो; विद्वान्-प्रवक्ता हो, किसी भी स्तर पर भाषाई शुद्धता के साथ जुड़ नहीं पाता; या तो उसमे रुचि नहीं है या फिर ज्ञान नहीं है।
अन्त मे, संयोजक-संचालक ने सबके प्रति आभार-ज्ञापन किया था।