डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
एक रात गाँव के रामदीन की पंद्रह साल की बेटी चंपा मजार पर अपनी माँ के साथ गई।
माँ ने चादर चढ़ाई।
चंपा बाहर खड़ी रही।
शरीफ ने उसे देखा।
“नाम क्या है?”
चंपा ने जवाब नहीं दिया।
माँ ने कहा, “चंपा।”
शरीफ ने लड़की को गौर से देखा।
फिर बोला—
“चंपा… तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।”
माँ घबरा गई।
“क्यों बाबा?”
शरीफ ने आँखें बंद कर लीं।
“कुछ परछाइयाँ जगह देखकर आती हैं।”
चंपा पहली बार डर गई।
“कौन-सी परछाईं?”
शरीफ ने आँखें खोलकर सीधे उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें जल्दी पता चल जाएगा।”
माँ ने बेटी का हाथ पकड़ लिया।
दोनों वहाँ से चली गईं।
उस रात चंपा को नींद नहीं आई।
उसे बार-बार वही आँखें याद आती रहीं।
और अगली सुबह उसने अपनी माँ से कहा—
“अम्मा, उस आदमी से दूर रहना।”
माँ ने डाँट दिया।
“फकीर बाबा हैं।”
चंपा चुप हो गई।
लेकिन उसने एक बात किसी को नहीं बताई।
जब वह मजार से लौट रही थी, उसने पीछे मुड़कर देखा था।
शरीफ उसे नहीं देख रहा था।
वह मजार की दीवार पर बनी एक छोटी-सी दरार में कुछ छिपा रहा था।
कुछ दिन बाद चंपा गायब हो गई।
शाम तक वह घर नहीं लौटी।
रामदीन पागलों की तरह गाँव में दौड़ता रहा।
किसी ने कहा—
“मौसी के घर गई होगी।”
किसी ने कहा—
“सहेली के यहाँ होगी।”
रात हो गई।
फिर भी कोई खबर नहीं।
आधी रात को रामदीन मजार पहुँचा।
शरीफ वहीं बैठा था।
“बाबा!”
शरीफ ने सिर उठाया।
“क्या हुआ?”
“मेरी लड़की नहीं मिल रही।”
शरीफ कुछ देर चुप रहा।
फिर तस्बीह फेरते हुए बोला—
“घबराओ मत।”
“कहाँ है?”
“जहाँ गई है, वहीं से लौटेगी।”
“कहाँ गई है?”
शरीफ ने आँखें बंद कर लीं।
“दक्षिण की तरफ पानी है।”
रामदीन का चेहरा पीला पड़ गया।
“नहर?”
शरीफ ने कोई जवाब नहीं दिया।
रामदीन दौड़ पड़ा।
कुछ लोग उसके साथ हो लिए।
नहर के पास खोज शुरू हुई।
करीब आधे घंटे बाद झाड़ियों में चंपा की चप्पल मिली।
फिर उसका दुपट्टा।
और फिर—
कुछ नहीं।
लड़की नहीं मिली।
गाँव में हड़कंप मच गया।
पुलिस आई।
मजार की भी तलाशी हुई।
शरीफ से पूछताछ हुई।
उसने बड़े आराम से कहा—
“मैंने तो पहले ही बताया था। लड़की दक्षिण की तरफ गई है।”
“तुम्हें कैसे पता?”
पुलिस वाले ने पूछा।
शरीफ मुस्कराया।
“फकीर को सब मालूम होता है।”
पुलिस वाले ने उसकी आँखों में देखा।
शरीफ ने भी उसकी आँखों में देखा।
दोनों कुछ पल खामोश रहे।
फिर पुलिस वाला उठ गया।
चंपा का कुछ पता नहीं चला।
लेकिन उस दिन पहली बार गाँव में दो तरह की बातें शुरू हुईं।
कुछ लोग बोले—
“फकीर बाबा ने पहले ही बता दिया था।”
और कुछ लोग फुसफुसाए—
“उसे पहले से कैसे पता था?”
तीन दिन बाद चंपा मिल गई।
लेकिन वह गाँव से करीब बीस किलोमीटर दूर एक कस्बे के बस अड्डे पर मिली।
डरी हुई।
चुप।
और अजीब बात यह थी कि उसे अपने पिछले तीन दिनों के बारे में कुछ याद नहीं था।
रामदीन उसे घर लेकर आया।
गाँव भर के लोग देखने पहुँचे।
शरीफ भी आया।
चंपा ने जैसे ही उसे देखा, वह काँपने लगी।
“इसे यहाँ से निकालो।”
सभी चौंक गए।
शरीफ ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“मुझे देखकर क्यों डर रही हो बेटी?”
चंपा पीछे हट गई।
“आपको सब पता है।”
“क्या?”
चंपा ने सिर पकड़ लिया।
“मुझे नहीं मालूम।”
शरीफ ने मुस्कराकर रामदीन से कहा—
“बच्ची डरी हुई है। इसे आराम चाहिए।”
वह मुड़ा और चला गया।
लेकिन बाहर निकलते समय उसने एक बार पीछे देखा।
चंपा उसे ही देख रही थी।
उसकी आँखों में डर से ज्यादा पहचान थी।
उस रात पहली बार चंपा ने अपने पिता को एक बात बताई।
“अब्बा… मैं मजार गई ही नहीं थी।”
रामदीन ठिठक गया।
“क्या?”
“जिस दिन मैं गायब हुई… मैं खेत की तरफ गई थी।”
“फिर?”
“फिर किसी ने पीछे से मेरा नाम पुकारा।”
“कौन?”
चंपा ने आँखें बंद कर लीं।
“आवाज शरीफ जैसी थी।”
रामदीन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“फिर?”
“उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं।”
“और?”
“जब होश आया तो मैं बस में थी।”
रामदीन ने बेटी का हाथ पकड़ा।
“पक्का?”
चंपा ने सिर हिलाया।
“लेकिन बापू… एक चीज और है।”
“क्या?”
चंपा ने अपनी मुट्ठी खोली।
उसमें एक छोटा-सा पीतल का टुकड़ा था।
उस पर कुछ खुदा हुआ था।
रामदीन पढ़ नहीं पाया।
सुबह वह उसे लेकर मास्टर दीनानाथ के पास गया।
मास्टर ने टुकड़ा देखते ही चेहरा बदल लिया।
“यह कहाँ मिला?”
“चंपा के पास था।”
मास्टर ने उसे कपड़े में लपेट दिया।
“इसे किसी को मत दिखाना।”
“क्यों?”
मास्टर ने धीमी आवाज में कहा—
“क्योंकि यह मजार का हिस्सा है।”
रामदीन ने चौंककर पूछा—
“क्या?”
“पुराने जमाने में मजार के पीछे लोहे का एक संदूक हुआ करता था। गाँव के बुजुर्ग कहते थे उसमें पीर बाबा से जुड़ी पुरानी चीजें रखी थीं।”
“अब?”
“संदूक गायब है।”
“कब?”
मास्टर ने उसकी तरफ देखा और कहा कि जिस साल शरीफ फकीर बना था।
उस शाम रामदीन अकेला मजार पहुँचा। सूरज डूब चुका था। मजार के बाहर कोई नहीं था। हवा में नीम की पत्तियाँ सरसराती थीं। रामदीन ने चारों तरफ देखा। फिर पीछे की तरफ चला गया। टूटी दीवार के पास मिट्टी कुछ नई-सी दिखाई दी।
उसने हाथ से मिट्टी हटाई। नीचे पत्थर था। पत्थर हटाया तो एक छोटा-सा गड्ढा दिखाई दिया। गड्ढे में कपड़े का एक पुराना टुकड़ा पड़ा था। उस पर सूखे हुए भूरे रंग के धब्बे थे।
रामदीन का हाथ काँप गया। तभी पीछे से आवाज आई—
“क्या खोज रहे हो?”
रामदीन जम गया। धीरे-धीरे पीछे मुड़ा और देखा कि शरीफ खड़ा था।
हाथ में तस्बीह।
चेहरे पर वही मुस्कान।
“मैं… बस ऐसे ही आया था।”
शरीफ ने गड्ढे की तरफ देखा।
फिर रामदीन की तरफ।
“हर आदमी जो खोदता है, उसे वही नहीं मिलता जिसकी उसे तलाश होती है।”
रामदीन चुप रहा।
शरीफ उसके करीब आया।
“चंपा कैसी है?”
“ठीक है।”
“अच्छा है।”
“उसे आपसे डर लगता है।”
शरीफ की मुस्कान गायब हो गई।
“डर अच्छी चीज है।”
“क्यों?”
“डर इंसान को जिंदा रखता है।”
वह आगे बढ़ा।
रामदीन पीछे हट गया।
शरीफ ने जाते-जाते कहा—
“और हाँ… बेटी से ज्यादा सवाल मत करना।”
रामदीन वहीं खड़ा रह गया।
—–‐———- क्रमशः