भक्तों को उनके भगवान् भी न बचा सके!

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

१९ अगस्त को “आ बैल! मार मुझे” की कहावत चरितार्थ होती दिखी; और वह भी ‘भगवान्’ के दरबार मे। इसके लिए पूरी तरह से राज्य-शासन और ज़िला-प्रशासन उत्तरदायी है। जब भगवान् के दरबार मे हाज़िरी लगाने के लिए उनके रजिस्टर मे कुल ८०० भगत-भगतिनो की संख्या दर्ज़ होनी थी तब ५० हज़ार का रेला वहाँ कहाँ से और कैसे पहुँच गया और अन्दर घुसता ही रहा, मानो अतिरिक्त उत्साह के साथ हमारे फ़ौजी सिर पर कफ़न बाँध सीमा पर चढ़ाई करने के लिए कूच कर रहे हों। परिणाम क्या हुआ– दो भक्त स्वर्ग सिधार गये। सैकड़ों की संख्या मे दब गये; बड़ी संख्या मे घायल हो गये हैं, जिनमे से कई की हालत गम्भीर बनी हुई है। जिस धर्म-कर्म को अपनाने से जीवन संकट मे पड़ जाये, उसका हमारे जीवन मे महत्त्व क्या है, इस दिशा मे लोग यदि सोचना आरम्भ कर देंगे तो जो देश इस समय ‘वेण्टिलेटर’ पर है, उसे ‘नया जीवन’ मिल सकेगा।

उपर्युक्त लज्जाजनक घटना मथुरा-स्थित बाँकेबिहारी मन्दिर की है। भक्ति का जोश ऐसा कि उस समय जिस किसी ने भी वह मंज़र देखा था, उस समय केवल ‘यमराज’ का काल्पनिक रूप दिख रहा था।

जिन पर भीड़ को नियन्त्रित करने की ज़िम्मादारी थी, वे ज़िला-प्रशासन और पुलिस-प्रशासन के उच्चपदस्थ अधिकारी निश्शुल्क बॉलकनी टिकट लेकर पूर्ण विशेषाधिकार के साथ अपने घर-परिवार, नाते-रिश्तेदारों तथा निकटस्थ परिचितों को ‘ह्वी० आइ० पी०’ के रूप मे कथित भगवान् का दर्शन करने-करवाने मे लगे थे। उनके परिवार और अन्य सभी सुरक्षित रहें, इसके लिए मन्दिर के ऊपरी मंज़िल के प्रवेशद्वार बन्द करा दिये गये थे। उन सभी अधिकारियों को होश नहीं था कि उनका मुख्य कर्त्तव्य क्या है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि देर रात २ बजे के लगभग भगवान् के अन्धभक्तों का एक ऐसा समूह मन्दिर मे उमड़ा, जिसने रही-सही व्यवस्था को भी ऐनक दिखा दिया था। भक्ति का जोश ऐसी रहा कि बेहोश-से दिख रहे दर्शनाभिलाषी एक-दूसरे के ऊपर चढ़े जा रहे थे। एक तरह से जीवन और मृत्यु के बीच अपने भगवान् की एक झलक पाने के लिए ‘मरी हुई’ आशा लिए बढ़े जा रहे थे। अधिकतर भीड़ मे दब चुके थे; दब रहे थे और दबाये जा रहे थे। वे “तौबा-तौबा” कहकर वहाँ से बचकर निकल भागना चाह रहे थे; परन्तु बहुत देर हो चुकी थी– न तो आगे निकलने का कोई उपाय दिख रहा था और न ही पीछे लौटने का। “मरता क्या न करता” की स्थिति बन चुकी थी; ‘जुगाड़तन्त्र’ भी सिर गड़ाये खड़ा था।

सच तो यह है कि किसी भी मतावलम्बी के आराधनास्थल मे उसके इष्टदेव बसते ही नहीं; वहाँ तो केवल उनका विग्रह है, जिसमे वास्तविक ‘प्राणप्रतिष्ठा’ भी नहीं। ऐसा इसलिए कि उसका आराध्यदेव अच्छी तरह से जानता है कि उनका वास्तविक भक्त कौन है। इसका मूल कारण है कि किसी भी मत के जितने भी लोग स्वयं को भक्त कहते हैं, वे वास्तव मे, ‘कामी’ होते हैं। सभी कुछ-न-कुछ संकुचित स्वार्थ के मारे होते हैं। सभी कहते हैं– मेरे लिए ऐसा कर दो.. हमे यह दे दो; वह दे दो। इस विश्व मे है कोई साधु, सन्त, महात्मा, फ़क़ीर, पीर इत्यादिक, जो इस अपने उपास्यदेव से इस आशय की आराधना करते हों– प्रभु/रब/वाहे गुरु/प्रभु यीशु/ महावीर स्वामी/बुद्ध स्वामी! इस संसार पर अपना प्यार लुटाता रह! मुझे सत्पथ का ज्ञान कराता रह; भटकूँ तो अँगुली पकड़ सन्मार्ग पर पहुँचाया कर। इसके विपरीत अभिलाष, आकांक्षा, इच्छा, चाहत, भूख इतनी प्रबल दिखती है कि ‘कामना’ भी शर्मिन्दगी की चादर ओढ़ मुह छिपा लेती है। मुझे जगद्गुरु की पदवी दिला दो; महामण्डलेश्वर बना दो; मेरे विरुद्ध जो हत्या, बलात्कार का केस चल रहा है, उसका निर्णय मेरे पक्ष मे करा दो; मुझे मन्त्री बनवा दो; मुझे पुत्र चाहिए; आइ० ए० एस० बनवा दो; डॉक्टर बनवा दो; मेरे हाथ पीले करवा दो; धन-धान्य से पूर्ण कर दो; मेरी सारी कामना पूरी कर दो। मेरे घर मे भूत-प्रेत है, दूर कर दो; मुझे बच्चा होता ही नहीं है, मेरी इच्छा पूरी कर दो… और न जाने कौन-कौन-मागे; मानसिक स्तर पर मागों की एक पूरी सूची रहती है। क्या यही भक्ति है? प्रत्येक मतावलम्बी का भगवान् अपनी शक्ति को हर मठ-मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारा इत्यादिक से हटा चुका है; क्योंकि वह जान चुका है, ये भक्त नहीं, ‘भौतिक भूखे’ हैं। यही कारण है कि देश मे जितने भी प्रकार के आराधनास्थल हैं, वहाँ कभी कोई आत्मिक चमत्कार नहीं हुआ है। होता भी है तो स्वयं को प्रचारित-प्रसारित कर स्थापित करने का वितण्डावाद। प्रत्येक वर्ष भक्त किन्हीं कारणो से मारे जाते हैं; परन्तु जड़वत् मूर्ति आदिक मे कहीं कोई स्पन्दन तक नहीं।

हमारे देश मे ऐसे मतावलम्बियों की संख्या, वह भी अच्छे-ख़ासे पढ़े-लिखों की हतप्रभ कर देनेवाली है, जो उसी बाँकेबिहारी मन्दिर मे पूर्व के वर्षों मे घटी घटनाओं से सीख न ले सके। २७ अप्रैल, २००९ ई०, २१ जुलाई, २०१२ ई०, १९ अगस्त, २०१२ ई०, ९ सितम्बर, २०१२ ई० तथा १ जनवरी, २०१७ ई० की घटनाओं मे दर्शनार्थियों के ऐसा अनियन्त्रित रेला आया कि भक्त लोग “त्राहि माम् पाहि माम्” करते रहे। उस समय भी कई लोग मारे गये और बुरी तरह से घायल हुए थे।

क्या ज़िला-प्रशासन और पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों को होश नहीं था– जिस मन्दिर-परिसर मे लगभग ८०० लोग आ-जा सकते हैं, वहाँ यदि एक साथ ५० हज़ार के लगभग लोग आ जायेंगे तो वह मंज़र कैसा होगा?

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २० अगस्त, २०२२ ईसवी।)