सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय दुमका की ओर से ११ जनवरी को दिशोम गुरु शिबू सोरेन की ७७वीं जन्मतिथि के अवसर पर एक अन्तरराष्ट्रीय आन्तर्जालिक संगोष्ठी आयोजित की गयी, जिसमे विशिष्ट अतिथि के रूप में गढ़ाकोटा शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय , सागर में हिन्दीविभाग के अध्यक्ष डॉ० घनश्याम भारती ने कहा, “महाजनी सभ्यता और सूदख़ोरी की प्रथा को समाप्त करने में दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने जिस संघर्ष का परिचय दिया था, वह स्तुत्य है।”
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रो० देवी प्रसाद द्विवेदी ने कहा, “झारखण्ड के सार्वजनिक विकास के लिए शिबू सोरेन का योगदान गौरवपूर्ण रहा है।
संगोष्ठी के मुख्य अतिथि देश के प्रमुख भाषाविद् आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “भाव में ही अभाव का दर्शन होता है। अभावग्रस्त झारखण्डी आदिवासियों को सम्मानपूर्वक जीने की कला दिशोम गुरु ने सिखायी थी।”
संयोजक डॉ० अजय शुक्ल ने कहा, “दिशोम गुरु ने आदिवासी-समुदाय के विकास के लिए जितने कार्य किये, वे गरिमापूर्ण रहे हैं।”
विशिष्ट अतिथि संयुक्त राज्य अमेरिका में हिन्दी स्कालर डॉ० नीलम जैन ने कहा, “शिबू सोरेन शोषित और दलित समाज के संरक्षक थे।”
विजय सिंह ने कहा, ”दिशोम गुरु के प्रत्येक कार्य आदिवासी-समुदाय के पक्ष में रहि है।”
सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका की कुलपति डॉ० सोना झरिया मिंज और पूर्व-प्रतिकुलपति डॉ० प्रमोदिनी हाँसदा ने कहा, “गुरु जी आदिवासी-समुदाय के स्वाभिमान पुरुष थे।”
डॉ० सूर्यकान्त त्रिपाठी (गोरखपुर) ने कहा, “शिबू सोरेन संघर्षपूर्ण ऐतिहासिक अध्याय के स्वर्णिम पृष्ठ रहे हैं।”
प्रो० शिवप्रसाद शुक्ल (प्रयागराज) ने कहा, “शिबू सोरेन का व्यक्तित्व क्रान्तिकारिक था।”