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तो क्या भारत के विदेशमन्त्री ने चीन को अपने ही देश के सैनिकों की हत्या कराने की ‘सुपारी’ दी थी?

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

हमारे सम्पादकीय के शीर्षक को समझने के लिए भारत के विदेशमन्त्री एस० जयशंकर के इस अदूरदर्शितापूर्ण कथन को समझा जा सकता है– गलवान में हमारे सैनिक निहत्थे नहीं थे। हमारे सैनिकों ने ‘समझौते’ के तहत गोलियाँ नहीं चलायी थीं।

सुब्रह्मण्यम जयशंकर (भारत के विदेश मंत्री)

उस विदेशमन्त्री से पूछा जाये– हमारे २५ से अधिक सैनिक हताहत हो रहे थे और उनसे भारत-सरकार के उपर्युक्त समझौते ने आत्मरक्षा करने का अधिकार क्यों और कैसे छीन लिया था? इसका अर्थ हुआ कि चीन के साथ भारत का जो समझौता हुआ था, वह इस बात की पुष्टि करता है कि भारत-सरकार ने पहले से ही हमारे सैनिकों की हत्या कराने की योजना बना ली थी। यदि नहीं तो जब चीनी सैनिकों के द्वारा हमारे मृत सैनिकों को धोखे से घेरकर उनकी हत्या की जा रही थी तब भारत-सरकार उस ‘समझौते’ पर फूल-माला चढ़ा और अगरबत्ती सुलगाकर उसकी पूजा क्यों कर रही थी? यह अलग विषय है कि देश की सरकार अब भी अर्थहीन वक्तव्य जारी कर उक्त प्रकरण की लीपा-पोती में लगी हुई है। अब तो जिस समझौते की बात विदेशमन्त्री जयशंकर कर रहे हैं, वह घटनाक्रम के आलोक में उनके द्वारा चीन को दी गयी ‘सुपारी’ की ही तरह लग रही है।

अब तो विदेशमन्त्री एस० जयशंकर को उस समझौते को सार्वजनिक करते हुए, देश को अवगत कराना होगा, जिसके अन्तर्गत भारत के सैनिकों की हत्या शत्रुदेश करता रहे और कथित समझौते के नाम पर हमारे सैनिक कायराना मौत मरते रहें, की व्यवस्था भारत-सरकार ने चीन के साथ मिलकर की है।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि जब शिवाजी अपने शत्रु के बुलावे पर तय शर्त के अनुसार, निहत्थे रूप में गये थे तब अपने साथ ‘बघनखा’ छिपा कर ले गये थे और शत्रु के छलपूर्वक आक्रमण करते ही उन्होंने अपना बघनखा निकाल कर अपनी रक्षा और प्रत्याक्रमण करते हुए, उस शत्रु का सीना चीर कर रख दिया था।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ जून, २०२० ईसवी)