
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
आज एक विचित्र-सा सम्प्रेषण देखा, जो दैनिक जागरण, इलाहाबाद में महाप्रबन्धक रह चुके श्रीवास्तव जी का है, जिसका शीर्षक उपर्युक्त है। वे क्या कहना चाहते हैं, कुछ सुस्पष्ट नहीं है।
बहरहाल, मैंने निम्नलिखित तरीक़े से अपनी टिप्पणी की है :——-
आपने धीरे से एक ‘महुआ’ टपका दिया, “पत्रकारों को क्या पार्टी बनना चाहिए” और सब उसे सूँघकर लोग मतवाले हुए जा रहे हैं। आप जब कुछ सम्प्रेषित किया कीजिए तब उसमें अर्थगाम्भीर्य भी दिखे, इसे ध्यान में रखा कीजिए। न कोई प्रसंग, न सन्दर्भ, एक अपूर्ण विचार टपका दिया।
जब किसी अख़बार में किसी अन्य अख़बार से सम्बन्धित समाचार भेजे जाते हैं तब उसे नहीं छापा जाता है; एक-दूसरे के साथ सम्पादक फ़ोन-माध्यम से संवाद नहीं करते; अपने को किसी अम्बानी से कम नहीं समझते हैं तब ऐसे संवेदनहीन पत्रकार संघटित हो सकेंगे।
अब आप ही बताइए— आप दैनिक जागरण, इलाहाबाद में महाप्रबन्धक थे तब कितनी बार हिन्दुस्तान अथवा अन्य समाचारपत्रों के महाप्रबन्धक के साथ संवाद करते थे; उनके दु:ख-दर्द में सम्मिलित होते थे?
पहले एक-दूसरे के प्रति भाव और विचार-स्तर पर संवाद का एक क्रम फिर व्यहार-स्तर पर मिलन का आयोजन कीजिए। इतना जब हो जायेगा तब सब कुछ होता जायेगा।
जहाँ तक पार्टी बनाने अथवा पक्षकार बनने का प्रश्न है, वह औचित्यविहीन है। आज वैसे ही मीडिया-जगत् में बहुत-कुछ आपत्तिजनक है, फिर पार्टी बनाकर अथवा पक्षकार बनकर उसकी विश्वसनीयता को डुबो देना, कहाँ की बुद्धिमत्ता है? हमारा पत्रकार जनसामान्य का पक्षकार तो बन नहीं पाता, फिर किसका पक्षकार बनाने की पहल कर रहे हैं? पक्षकार बनना ही है तो मीडिया-जगत् में जो लोग अभावग्रस्त हैं; जिन्हें उनका प्रबन्धतन्त्र परेशान कर रहा है; अयोग्यता के बाद भी सिफ़ारिश के आधार पर जिन्हें मीडिया में रखा जा रहा है; जहाँ अपरिपक्व पत्रकारिता की जा रही है, वहाँ सुधार लाने के लिए पक्षकार बनने का आह्वान क्यों नहीं करते?
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ८ अगस्त, २०१८ ईसवी)