इलाहाबाद का प्रशासनतन्त्र नकारा निकला!

'काँवरिये' मस्त-जन-जीवन त्रस्त!..?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


यह कैसा ‘कर्मकाण्डीय धर्म’ है, जहाँ ‘धर्म’ के नाम पर समूची मानव-सभ्यता का बलिदान करने के लिए शासन से प्रशासन तक प्रतिबद्ध है।

मुट्ठीभर काँवरिये के लिए ‘विशेष सुविधा’ की अलग से व्यवस्था क्यों की गयी है?

यह प्रश्न है, इलाहाबाद-स्थित ‘शास्त्री पुल’ मार्ग पर हज़ारों की संख्या में ८ से १२ घण्टे तक मार्ग-अवरोध के कारण फँसे आबाल वृद्ध नर-नारी का, जिनके बच्चे भूख-प्यास से बिलबिला रहे थे; गम्भीर रोग से पीड़ित व्यक्ति को एम्बुलेंस से ले जा रहे परिवार के सदस्य हाथ जोड़कर अस्पताल तक जाने का मार्ग माँग रहे थे; शिक्षण-संस्थानों से घर के लिए लौट रहे विद्यार्थी; अपनी कार्य-सिद्धि के लिए घर से बाहर जा रहे और अपनी रेलगाड़ी छूट जाने का दु:ख व्यक्त कर रहे थे; कार्य कर घर लौट रहे महिला-पुरुष भूख-प्यास से तड़पते हुए, सहायता की याचना कर रहे थे। परिदृश्य ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो जीवन ने विराम ले लिया हो।

ऐसे में, प्रश्न है, ये सब हुआ कैसे?
उत्तर सुस्पष्ट है, इलाहाबाद-प्रशासन के ‘काँवरिया-प्रेम’ के चलते। प्रशासन ने काँवरियों को विशेष सुविधा देते हुए, प्रत्येक सड़क-मार्ग को उनके लिए ‘एकतरफ़ा’ बना दिया है; यानी जिस ओर से काँवरिये जायेंगे, उस ओर से अन्य राहगीर, वाहन आदिक नहीं चलेंगे। इसका परिणाम यह हुआ कि कल (७ अगस्त, २०१८ ईसवी) धर्मान्ध और निरंकुश काँवरिये ट्रैक्टर, ट्रॉली तथा अन्य वाहन लेकर अवैध रूप में मार्ग के दोनों ओर प्रवेश कर गये, जिसके कारण ज़िला-प्रशासन-द्वारा जनसामान्य को एक ही मार्ग से आने और जाने की व्यवस्था देने के कारण यातायात-व्यवस्था अवरुद्ध हो गयी थी।

ज्ञातव्य है कि ‘शास्त्री पुल’ इलाहाबाद में गंगा नदी पर बनाया गया है। यह एक सड़क-मार्ग से जुड़ा हुआ है, जिसका अत्यन्त विस्तार है। यह सड़क-मार्ग वाराणसी, बलिया, छपरा, कोलकाता, नेपाल तथा और आगे तक के स्थानों को जोड़ता है। इस पुल से प्रतिदिन लगभग ५० हज़ार लोग और हज़ारों की संख्या में वाहनों का आवागमन होता है। ऐसे में, इस पुल पर ज़िला-प्रशासन, यातायात-प्रबन्धन, सुरक्षा-तन्त्र इत्यादिक की गम्भीर व्यवस्था करनी चाहिए थी और सतर्क दृष्टि रखनी चाहिए थी।

मेरे घर (अलोपीबाग़) से बैरहाना तक (लगभग २ कि० मी०) और अलोपीबाग़ से झूसी (लगभग ३ कि०मी०) तक भीषण रूप में जनसामान्य और तरह-तरह के वाहनों की दशा और दिशा ऐसी लग रही थी, मानो काँवरियों के कुत्सित कारनामों ने उन्हें बन्धक बना लिया हो और तथाकथित भगवाभक्ति से मन्त्रमुग्ध इलाहाबाद-ज़िला-प्रशासन तथा उक्त समस्त व्यवस्था-तन्त्र आदेश की प्रतीक्षा में काँवरियों के समक्ष नतमस्तक खड़ा हो।
धिक्कार है, इलाहाबाद के ज़िलाधिकारी और इलाहाबाद यातायात-व्यवस्था के प्रमुख को, जो यह जानते हुए भी कि इलाहाबाद का शास्त्री पुल-मार्ग कितना संवेदनशील है, कानों में ठेप्पी लगाये बैठे रहे और आँखों पर कर्त्तव्यविहीनता का चश्मा!..?

इससे पहले जो इलाहाबाद का ज़िलाधिकारी था, वह निष्क्रिय तो था ही, यह भी संवेदनहीन है। इसको तत्काल निलम्बित कर समुचित दाण्डिक कार्यवाही करायी जानी चाहिए।

रुपये उगाहने के लिए सफ़ेद बाइक लेकर यातायात-विभाग के अधिकारी मनचाहे और मनबढ़ तरीक़े से किसी भी पुल के किनारे खड़े होकर अवैध तरीक़े से रुपये की वसूली करते हैं; परन्तु जनसामान्य को सड़क-मार्ग पर अभय और कण्टकरहित होकर चलने का जो अधिकार है, उसे सुनिश्चित कर, उसे निरापद (सुरक्षित) करने की चिन्ता नहीं है। इलाहाबाद का पुलिस-प्रशासन भी उतना ही दाग़ी है।

अधिकतर काँवरिये गुण्डे होते हैं, जो धर्म का ‘लाइसेंस’ लेकर बीभत्स कृत्य करते हैं; अपने दुश्चरित्र के कारण जान से भी हाथ धोते हैं। पुलिस इन धार्मिक उन्मादियों की तलाशी क्यों नहीं लेती है?
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ८ अगस्त, २०१८ ईसवी)