अपराध का ‘विकास’ अब बन कर रह गया ‘इतिहास’

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

लगभग तीन दशकों तक उत्तरप्रदेश में ‘आतंक’ का पर्याय बना रहा, कानपुर के आठ पुलिसकर्मियों की निर्मम हत्या का मुख्य आरोपित कानपुर का विकास दुबे एक बहुत ही नाटकीय अन्दाज़ में आज (१० जुलाई) उत्तरप्रदेश के एस०टी०एफ० के हत्थे चढ़ गया था, जिसका परिणाम विकास दुबे की एस०टी०एफ० के साथ मुठभेड़ में हत्या रहा। मैंने अपने ९ जुलाई के सार्वजनिक हुए ज्वलन्त लेख में उस ओर संकेत कर दिया था कि ‘उज्जैन से कानपुर’ तक पहुँचते-पहुँचते, विकास दुबे के साथ आज की घटित ‘अनहोनी’ हो सकती है।

पुलिस-सूत्रों के अनुसार, उज्जैन से कानपुर की ओर आ रही एस०टी०एफ० की गाड़ी जब कानपुर की सीमा में पहुँची थी तभी विकास दुबे ने पुलिसकर्मियों से हथियार छीनने की कोशिश की थी, जिसके कारण वह गाड़ी असन्तुलित होकर पलट गयी थी। गाड़ी पलटने के बाद वह हथियार लेकर भागने लगा था और उसके पीछे उत्तरप्रदेश का एस०टी०एफ० भागा। विकास दुबे ने पीछा कर रहे एस०टी०एफ० पर गोलियाँ चलायीं। अपने बचाव में एस०टी०एफ० ने भी गोलियाँ चलायी थीं।

पूर्वाह्न ७.१५ से ७.३५ पूर्वाह्न तक कानपुर के ‘भौंती’ के पास एस०टी०एफ० और विकास दुबे एक-दूसरे पर गोलियाँ दाग़ते रहे। विकास दुबे के सिर और सीने में गोलियाँ लगीं और वह धराशायी हो गया, फिर भी उसे हस्पताल में ले जाया गया, जहाँ डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया था।

विकास दुबे की हत्या से वे सभी साक्ष्य भी मिट गये हैं अथवा यों कहें, मिटा दिये गये हैं, जिनके आधार पर देश के नामी-गिरामी राजनेता और पुलिस-अधिकारी जाँच के दाइरे में आ रहे थे, जिनमें सत्ताधारी दल के अनेक बड़े नेताओं के नाम भी शामिल थे। फिर भी इतना अवश्य है कि पुलिस-सूत्रों के आधार पर रहस्य-रोमांच से भरपूर इस घटना ने इतने प्रश्न खड़े कर दिये हैं कि एस०टी० एफ० के लिए उन प्रश्नों के उत्तर दे पाना सहज नहीं है। यही कारण है कि सभी पुलिस-अधिकारी मीडियाकर्मियों के आक्रामक प्रश्न-प्रतिप्रश्नों से बचते आ रहे हैं।

दूसरी ओर, यह भी सच है कि पुलिस ने एनकाउण्टर की योजना बनाते समय यह भी तैयारी कर ली होगी कि न्यायालय में अपने को पाक-साफ़ कैसे साबित करना है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १० जुलाई, २०२० ईसवी)