यह बिन्ना है। तिक्तशीतकाल की पर्णहीन व्यथा से अब मुक्त हो चुका है। यह पर्णहीन तो अब भी है पर कुसुमाभरण से सघन अलंकृत है। मधुमास में इसके पुष्प इतने मधुसने की मधुलोभी कीटों का अबाध मधुपान अनवरत चल रहा है। यह उन्हें पराग कणों का भोग योग निमंत्रण दे मधुमत्त किये दे रहा है और प्रत्येक पुष्प की स्मित मुस्कानों ने लजीले अवगुंठनो को उतार फेंका है। बिन्ना, सर्वस्व लुटा देने के आनंद में मगन है।
बिन्ना अब विरहिणी राम्या के शोक गीत नहीं, बल्कि शीतल चंद्रप्रभा में प्रियतम के मधुर मिलन के आह्वान गीत गाता है। इसकी शाखा शलाकाएँ सतत आनुपातिक सुगंध के सुमन्द-रागशिक्त मदनीय प्रसार में तल्लीन है।
सच मानो तो, बिन्ना गोचर प्रपंचों में मगन दिखता है पर ऐसा है नहीं। यह चिति, गति और यति में संतुलन बनाए रखने को प्रेरित करता है। चिति सौंदर्य है। गति प्रेम है। यति मृत्यु है। इसी संतुलन के कारण जीवन को जीवनी शक्ति प्राप्त होती है अन्यथा अनंत में अंत गति।
बिन्ना का रूप शृंगार काम लगन की उन्माद अवस्था है । काम ऊर्जा में सृष्टि का नव-सृजन भी है। जात -जीवो के सतत आवागमन के कारण ही विश्वधरा विराट ऋतंभरामती है। विराट से बिंदु, बिंदु के विराट में लीन होने की प्रणव- ध्वनि, गूंज-राग में वीतराग अन्तःदेश की ओर ले जाती है और तब बाहरी संसार नीरस जान पड़ता है। इसलिए बिन्ना ऋतावरी होकर नव- प्रेमियों को तारुण्य कांक्षणाओं की ज्ञान बोध उत्तरमाला प्रस्तुत करता हुआ रूपोदभाविनी शक्ति का संचार करते हुए संदेश देता है :-
मैं लुटा रहा हूँ सुमन सुरभि,
तुम झोली भर-भर ले जाओ।।
मेरे गीतों को अपने स्वर में,
प्रिय, एक बार फिर गा जाओ ।।
अवधेश कुमार शुक्ला
मूरख हिरदय (मूर्खों की दुनिया)
सतुआही अमावस्या कृष्ण
30/04/2022